पुलिस कर रही मामले की जांच, सुरक्षित समर्पण’ (Safe Surrender) जैसे कानूनों की जानकारी न होना और सामाजिक कलंक का डर ले रहा मासूमों की जान
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले (जनपद) से समाज के माथे पर कलंक लगाने वाली एक बेहद हृदयविदारक घटना सामने आई है। बस्ती जनपद के दुबौलिया थाना क्षेत्र अंतर्गत सिरसिया गांव जाने वाले मार्ग पर स्थित एक नर्सरी बाग की झाड़ियों में बुधवार सुबह एक झोले के अंदर कपड़े में लिपटा हुआ नवजात शिशु का शव बरामद हुआ है। इस घटना ने एक बार फिर सामाजिक पतन, कानूनी अज्ञानता और प्रशासनिक तंत्र की जमीनी पहुंच पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 7:00 बजे ग्रामीण सिरसिया गांव को जाने वाले मार्ग पर प्राथमिक विद्यालय के निकट से गुजर रहे थे। तभी उनकी नजर नर्सरी बाग की झाड़ियों पर पड़ी, जहां कौवों का एक झुंड मंडरा रहा था। अनहोनी की आशंका में जब ग्रामीण नजदीक गए, तो वहां एक झोले में कपड़े से लिपटा हुआ नवजात का शव पड़ा था।
कुएं में मिली नवजात बच्ची की शव, फिर उठे बाल संरक्षण तंत्र पर सवाल…
घटना की सूचना तुरंत डायल 112 और जनपद की दुबौलिया पुलिस को दी गई। थानाध्यक्ष जीवन त्रिपाठी ने बताया कि गांव के चौकीदार की तहरीर पर शव का पंचनामा कर लिया गया है और शिनाख्त के लिए विधिक कार्रवाई की जा रही है। प्रथम दृष्टया शिशु को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उसे महज एक-दो घंटे पहले ही वहां फेंका गया था। प्रशासनिक स्तर पर अब पुलिस स्थानीय आशा (ASHA) और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के सहयोग से आसपास के गांवों में हाल ही में हुए प्रसव (Deliveries) और गर्भवती महिलाओं का डेटा खंगाल रही है, ताकि आरोपी परिजनों तक पहुंचा जा सके।
नवजात को लावारिस छोड़ना एक गंभीर अपराध भारतीय न्याय व्यवस्था और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम (Juvenile Justice Act) के तहत किसी भी नवजात को इस तरह लावारिस अवस्था में फेंकना या त्यागना एक गंभीर गैर-जमानती अपराध है।
कानून के तहत 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे को असुरक्षित स्थान पर छोड़ने वाले माता-पिता या अभिभावक के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है।
ऐसे मामलों में ‘बाल कल्याण समिति’ (CWC) और जनपद की बाल संरक्षण इकाई (DCPU) को भी तुरंत संज्ञान लेकर इलाके में निगरानी बढ़ानी होती है।
सामाजिक पहलू और जागरूकता की सख्त जरूरत (Safe Surrender Policy) यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक विफलता का भी प्रतीक है। लोक-लाज का डर, अनचाहा गर्भ या बेटा-बेटी का भेद—कारण चाहे जो भी हो, सजा हमेशा उस बेगुनाह नवजात को मिलती है।
समाज को यह जागरूक करने की सख्त जरूरत है कि यदि कोई माता-पिता या अविवाहित मां अपने बच्चे को पालने में असमर्थ है, तो वे उसे झाड़ियों या कूड़ेदान में फेंकने के बजाय कानूनी रूप से ‘सुरक्षित समर्पण’ (Safe Surrender) कर सकते हैं।
सरकार की ‘पालना’ (Palna) योजना के तहत अस्पतालों, अनाथालयों और बाल गृहों के बाहर पालने लगे होते हैं।
बाल कल्याण समिति (CWC) या चाइल्डलाइन (1098) को बच्चा सौंपने पर माता-पिता की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाती है और उन पर कोई पुलिस केस या कानूनी कार्रवाई नहीं होती है।
इस मासूम की मौत पूरे उत्तर प्रदेश और समाज के लिए एक चेतावनी है। जरूरत है कि जिला प्रशासन ग्रामीण स्तर पर सुरक्षित समर्पण के कानूनों का व्यापक प्रचार-प्रसार करे, ताकि भविष्य में किसी और नवजात को झाड़ियों में दम न तोड़ना पड़े।




















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