जब दरगाह में उड़ा अबीर-गुलाल… और मिट गईं मजहबी दीवारें! रंगों की उड़ान… इंसानियत की पहचान… और मजहब से ऊपर उठता भाईचारा…
बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। होली के पावन अवसर पर बाराबंकी जिले के देवा स्थित सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर बुधवार को सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत नजारा देखने को मिला। करीब सवा सौ साल पुरानी परंपरा को निभाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के हजारों जायरीन देवा शरीफ पहुंचे। मजार परिसर में “वारिस पिया के जयकारों” के बीच जब अबीर-गुलाल उड़ा, तो मानो मजहबी दीवारें ढह गईं और चारों ओर इंसानियत का रंग बिखर गया। दरगाह परिसर में बड़ी संख्या में पहुंचीं महिलाओं और युवतियों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया और गुलाब की पंखुड़ियां बरसाकर प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।
ढोल-नगाड़ों की थाप और रूहानी कव्वालियों के बीच श्रद्धालु हाथों में हाथ डालकर झूमते नजर आए। यह दृश्य सूफी संत हाजी वारिस अली शाह के उस संदेश को जीवंत कर रहा था— “जो रब है वही राम।” दरगाह पर मौजूद हर व्यक्ति धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर एक ही रंग में रंगा दिखाई दिया। देवा शरीफ की यह होली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान रखती है। यहां यह उत्सव केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का माध्यम माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार सदियों से चली आ रही इस परंपरा में सभी धर्मों के लोग मिलकर गुलाल उड़ाते हैं और आपसी प्रेम का संदेश देते हैं।
मजार पर हाजिरी देने पहुंचे श्रद्धालु अजय कुमार निगम और प्रताप जायसवाल सहित अन्य लोगों ने कहा कि देवा शरीफ की होली दुनिया की सबसे खूबसूरत और सौहार्दपूर्ण होली है, जहां नफरत के लिए कोई स्थान नहीं है।






















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