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विशेष आलेख: टंडवा से गिद्धौर तक रेलवे निर्माण की आड़ में महालूट; खामोश सियासत और ‘साइलेंट सिंडिकेट’ का बड़ा खुलासा

On: May 16, 2026 4:34 PM
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शिवपुर-कठौतिया रेलवे लाइन निर्माण में लगी कंपनियों की मनमानी; 10.98 एकड़ सरकारी जमीन को 32 फीट गहरा खोदा, पक्ष-विपक्ष की चुप्पी से जनता में मायूसी

आलेख: न्यूज़ स्केल लाइव | शशि पाठक

चतरा जिले के टंडवा, सिमरिया, पत्थलगड़ा और गिद्धौर प्रखंड में शिवपुर-कठौतिया रेलवे लाइन के निर्माण की आड़ में जो खेल चल रहा है, वह अब किसी से छिपा नहीं है। निर्माण कार्य में जुटी नामचीन कंपनियों— रॉयल, इरकॉन, मिलेनियम और झांझरिया की धांधली और मनमानी अब चतरा की जनता के सामने आ चुकी है।

टंडवा के बीडीओ-सह-प्रभारी सीओ देवलाल उरांव द्वारा बीते 30 अप्रैल को की गई प्रारंभिक जांच ने इस महाघोटाले की पहली परत खोली। जांच में पाया गया कि नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर 10.98 एकड़ भूमि से 32 फीट की गहराई तक अवैध खनन कर मिट्टी की चोरी की गई है। चतरा उपायुक्त (DC) द्वारा जारी विज्ञप्ति संख्या 02 (दिनांक 4 मई 2026) का आधिकारिक बयान इस पूरे घटनाक्रम की भयावहता की तस्दीक करता है। फिलहाल टंडवा थाना में कांड संख्या 103/2026 दर्ज कर मामले की जांच की जा रही है, लेकिन बीडीओ के इस कड़े एक्शन ने सफेदपोश बिचौलियों और भ्रष्ट कारोबारियों के सिंडिकेट में भारी बेचैनी पैदा कर दी है।

करोड़ों का घोटाला और ‘पेमेंट तकनीक’ का खेल

यह सोचना बचकाना होगा कि रातों-रात दर्जनों एकड़ सरकारी जमीन, जंगल, नदी और पहाड़ों को तीस फीट से ज्यादा गहरा खोद दिया गया और किसी भी विभाग को भनक तक नहीं लगी। सूत्रों की मानें तो इस महाघोटाले को अंजाम देने से पहले एक मुकम्मल और ‘अभेद्य आपराधिक सिंडिकेट’ तैयार किया गया था।

“इस सिंडिकेट में रेलवे, खनन, वन और राजस्व विभाग के कुछ रसूखदार अधिकारियों के साथ-साथ पर्दे के पीछे रहने वाले सफेदपोशों और प्रतिबंधित संगठनों की भी हिस्सेदारी तय थी। विरोध की हर आवाज को दबाने के लिए एक विशेष ‘पेमेंट तकनीक’ का सहारा लिया गया, जहां संबंधितों और उनके परिजनों के खातों में सीधे पैसे पहुंचाकर उनकी बोलती बंद कर दी गई। जहाँ प्रलोभन काम नहीं आया, वहाँ अपराधियों के जरिए भय का माहौल बनाया गया और इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु खनन विभाग बना रहा।”

लॉ एंड ऑर्डर वर्सेस केंद्रीय परियोजना: दोहरी विफलता

चूंकि यह मामला सीधे तौर पर केंद्रीय विभाग (रेलवे) के संवेदकों द्वारा हजारों करोड़ रुपये के आर्थिक अपराध और धांधली से जुड़ा है, वहीं कानून-व्यवस्था (Law & Order) को बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। देखा जाए तो इस मामले में दोनों ही स्तरों पर तंत्र पूरी तरह विफल साबित हुआ है।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आम दिनों में एक-दूसरे की नीतियों पर जमकर कीचड़ उछालने वाले पक्ष और विपक्ष के स्थानीय नेताओं को इस महाघोटाले पर मानो सांप सूंघ गया है। जनप्रतिनिधियों की यह ‘रहस्यमयी चुप्पी’ चतरा की जनता को सबसे ज्यादा कचोट रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पारदर्शी जांच और कठोर कार्रवाई में स्थानीय सांसद एवं विधायक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि वे इस गंभीर मुद्दे को सदन (लोकसभा/विधानसभा) में उठाकर केंद्रीय जांच एजेंसियों (जैसे CBI या ED) से जांच की मांग करें, तो इस सिंडिकेट के मंसूबों पर पानी फेरा जा सकता है। लेकिन मामला उजागर होने के 15 दिनों के बाद भी छाई राजनीतिक खामोशी बेहद निराशाजनक है।

बुद्धिजीवियों की पहल: न्यायालय और ग्रीवांस पोर्टल का सहारा

भले ही राजनीतिक गलियारों में सन्नाटा पसरा हो, लेकिन चतरा के सजग बुद्धिजीवियों का एक दल इस पूरे मामले पर बारीक नजर रखे हुए है। इस दल ने हार मानने के बजाय एक ऑनलाइन जागरूकता मुहिम शुरू की है।

बुद्धिजीवियों द्वारा सीधे केंद्र और राज्य सरकार के उच्च अधिकारियों के ग्रीवांस पोर्टल (शिकायत निवारण पोर्टल) पर दस्तावेजी सबूत अपलोड किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, यह दल अब सक्षम न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है, ताकि चतरा के प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वाली कंपनियों और उन्हें संरक्षण देने वाले चेहरों को बेनकाब कर कानून के कठघरे में घसीटा जा सके। कठघरे में पूरा सिस्टम खड़ा है, अब देखना यह है कि टंडवा, सिमरिया, पत्थलगड़ा और गिद्धौर की इस बेखौफ लूट पर इंसाफ का हंटर कब चलता है।

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