
कहते हैं लक्ष्मी चंचल होती हैं। धन की प्राप्ति हर किसी को हो सकती है, लेकिन उस धन के साथ संयम, संतुलन और धर्म का मार्ग अपनाना विरले ही कर पाते हैं। अक्सर देखा जाता है कि अपार संपत्ति मिलने के बाद व्यक्ति या तो अहंकार और वैभव के नशे में भटक जाता है, या फिर उसी धन को समाज और धर्म के हित में लगाकर नई ऊंचाइयों को छूता है।
राजस्थान के भरतपुर जिले के बयाना क्षेत्र के उद्योगपति नेमीचंद शर्मा उन चुनिंदा व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं, जिन्होंने धन और धर्म दोनों को समान भाव से साधने का प्रयास किया है। खनिज उद्योग में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके नेमीचंद शर्मा ने न केवल व्यवसायिक क्षेत्र में सफलता पाई, बल्कि धार्मिक कार्यों में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है।
राम मंदिर निर्माण में सहयोग
नेमीचंद शर्मा बताते हैं कि अयोध्या धाम में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के दौरान उन्होंने लगभग 100 करोड़ रुपये मूल्य के पत्थरों का सहयोग प्रदान किया। इसे वे अपने जीवन का सौभाग्य और प्रभु राम का आशीर्वाद मानते हैं। व्यक्तिगत रूप से मुलाकात के दौरान उनका सादा और विनम्र व्यक्तित्व आश्चर्यचकित करता है। अपार संपत्ति के बावजूद उनमें किसी प्रकार का दंभ या प्रदर्शन नहीं दिखाई देता। संत समाज से जुड़े लोगों के अनुसार, वे अन्य धार्मिक परियोजनाओं में भी सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। बताया जाता है कि उन्होंने स्वामी प्रमोद कृष्णन के सान्निध्य में प्रस्तावित कल्कि मंदिर में भी पत्थरों के सहयोग का संकल्प व्यक्त किया है।
शिखर स्थापना के पावन अवसर पर उपस्थिति
22 फरवरी को अयोध्या में मंदिर शिखर स्थापना के पावन अवसर पर भी नेमीचंद शर्मा को आमंत्रित किया गया। इससे पूर्व वे रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भी सहभागी रहे थे। धन और धर्म का संतुलन साधना आसान नहीं होता, किंतु नेमीचंद शर्मा का उदाहरण यह दर्शाता है कि यदि संसाधनों का सदुपयोग आस्था, सेवा और समाजहित में किया जाए तो वह केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज को गौरवान्वित करता है।धन तभी सार्थक है जब वह लोककल्याण और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में समर्पित हो — और यही संदेश इस प्रेरक कथा से उभरकर सामने आता है।
रिपोर्ट: रमेश शर्मा, राजस्थान ब्यूरो






















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