गिद्धौर (चतरा)। मनरेगा गरीबों के रोजगार का अधिकार है, लेकिन गिद्धौर प्रखंड में यह योजना कुछ लोगों की कमाई का ज़रिया बनकर रह गई है। लाभुक कमीशन की मार झेल रहा है और मेहनत का पूरा हक अब भी सवालों में है। मजदूर काम करें, पर कमाई हिस्सा-बांट में गायब हो जाए-लाभुक के पसीने का मूल्य आखिर कौन लौटाएगा? प्रखंड में मनरेगा की स्थिति काफी लचर हो चुकी है। मनरेगा का संचालन अतिरिक्त प्रभार में होने से योजनाएँ सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही हैं। प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में 9643 सक्रिय मजदूर पंजीकृत हैं, लेकिन मात्र 273 को ही काम मिल पा रहा है, उसमें वैसे लोग शामिल हैं। स्थिति यह है कि कई मजदूरों को दूसरे प्रदेशों में पलायन करना पड़ रहा है। आवास और आम बागवानी योजना को छोड़कर डोभा, तालाब जैसी कई प्रमुख योजनाएं ठप पड़ी हुई हैं, जिससे ग्रामीण मजदूरों को रोज़गार नहीं मिल रहा है। मनरेगा का संचालन फिलहाल पत्थलगड्डा के कार्यक्रम पदाधिकारी बिनोद कुमार गुप्ता और इटखोरी के कनीय अभियंता प्रियरंजन राहुल के अतिरिक्त प्रभार में चल रहा है। छह रोजगार सेवकों में से पाँच ही उपलब्ध हैं और तीन की जगह मात्र एक कंप्यूटर ऑपरेटर से काम चल रहा है। स्थाई बीपीओ, जेई और कंप्यूटर ऑपरेटर की कमी से मनरेगा कार्यों का निष्पादन बुरी तरह प्रभावित है। प्रखंड विकास पदाधिकारी राहुल देव ने जिले से स्थाई बीपीओ और जेई की पदस्थापना की मांग की है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस अव्यवस्था का फायदा वही लोग उठा रहे हैं जो उगाही के माध्यम से लाभुकों का हक़ मारते हैं।
मनरेगा की व्यवस्था गिद्धौर में चरमराई, मजदूरों को रोजगार के लिए करना पड़ रहा पलायन, कुछ लोगों की कमाई का बना ज़रिया
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