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नाबालिग प्रेमी युगल की जंगल में मिली जोड़ी, मंदिर में करा दी शादी!

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परिजनों की सहमति से विवाह कराने पर उठे सवाल, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और जेजे एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग

हजारीबाग। चलकुशा प्रखंड क्षेत्र के रागडीह गांव में नाबालिग प्रेमी युगल को ग्रामीणों द्वारा जंगल में पकड़े जाने और बाद में दोनों परिवारों की कथित सहमति से मंदिर में शादी कराए जाने का मामला सामने आया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने की बात कही जा रही है। नाबालिगों से जुड़ा मामला होने के कारण अब इस पूरे घटनाक्रम की कानूनी स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार, दोनों नाबालिग एक निजी विद्यालय में पढ़ते हैं और पिछले कुछ समय से उनके बीच प्रेम संबंध होने की बात बताई जा रही थी। 15 अगस्त को दोनों अपने-अपने घर से विद्यालय में झंडोत्तोलन कार्यक्रम में शामिल होने की बात कहकर निकले थे। विद्यालय पहुंचने के बाद दोनों कथित तौर पर जंगल की ओर चले गए।

दोनों के जंगल की ओर जाने की जानकारी मिलने पर ग्रामीणों ने उनकी तलाश शुरू की। ग्रामीणों ने दोनों को जंगल में पकड़ लिया और इसकी सूचना उनके परिजनों को दी। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच बातचीत हुई।

बताया गया कि ग्रामीणों की पहल और परिजनों की सहमति के बाद शनिवार को बेड़ोकला स्थित एक मंदिर में दोनों का विवाह करा दिया गया। विवाह के दौरान दोनों के परिजन और ग्रामीण मौजूद थे। विवाह से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होने की बात भी सामने आ रही है।

परिजनों की सहमति से नाबालिग का विवाह कानूनी नहीं हो जाता

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत पुरुष के 21 वर्ष और महिला के 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं करने की स्थिति में विवाह को बाल विवाह माना जाता है। अधिनियम की धारा 3 के तहत ऐसा विवाह संबंधित बाल पक्षकार के विकल्प पर निरस्त कराया जा सकता है। वहीं, बाल विवाह कराने, उसे संपन्न कराने या उसके आयोजन को बढ़ावा देने अथवा अनुमति देने वालों के खिलाफ अधिनियम की धाराओं 9, 10 और 11 के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।

जेजे एक्ट के तहत बच्चों की सुरक्षा भी जरूरी

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति बच्चा है। यदि किसी बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार हुआ हो जिससे उसके अधिकारों या सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो अथवा किसी अन्य कानून का उल्लंघन हुआ हो, तो उसे देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे के रूप में संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

ऐसे मामलों में बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) को बच्चों की सुरक्षा, कल्याण और परिस्थितियों की जांच करने तथा आवश्यकता पड़ने पर सामाजिक जांच और पुनर्वास से संबंधित निर्देश देने की शक्तियां प्राप्त हैं। जेजे एक्ट की धारा 29 और 30 के तहत समिति बच्चों की देखरेख, संरक्षण, पुनर्वास और परिवार में सुरक्षित पुनर्स्थापन से संबंधित कार्रवाई कर सकती है।

प्रशासन की भूमिका पर भी उठे सवाल

मामले में अब यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है कि दोनों बच्चों की वास्तविक आयु क्या है, विवाह से पहले उनकी उम्र का सत्यापन किया गया था या नहीं और मंदिर में विवाह कराने से पहले बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी, पुलिस, बाल संरक्षण इकाई अथवा बाल कल्याण समिति को इसकी जानकारी दी गई थी या नहीं।

यदि दोनों में से कोई भी पक्ष कानून में निर्धारित आयु से कम था, तो केवल माता-पिता अथवा ग्रामीणों की सहमति के आधार पर विवाह करा देना कानूनी दायित्वों से मुक्त नहीं करता। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में ऐसे विवाह को बढ़ावा देने या उसे संपन्न कराने वालों के लिए दंड का प्रावधान है। फिलहाल पूरे मामले में संबंधित प्रशासन और पुलिस की ओर से आधिकारिक कार्रवाई अथवा जांच की स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। बच्चों की पहचान और निजता की सुरक्षा भी इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है।

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