लोहरदगा। झारखंड शिक्षा परियोजना, लोहरदगा के बैनर तले आज समावेशी शिक्षा को लेकर एक बड़ा शंखनाद किया गया। न्यू नगर भवन में आयोजित एक दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यशाला में जिले भर के शिक्षकों, प्रशासकों और अभिभावकों को यह संकल्प दिलाया गया कि कोई भी दिव्यांग बच्चा शिक्षा की मुख्य धारा से पीछे नहीं छूटेगा।
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए जिला शिक्षा पदाधिकारी दास सुनंदा चंद्रमौलेश्वर ने बेहद भावुक और कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा:
”दिव्यांग बच्चे भी देश की भावी पीढ़ी हैं। शिक्षकों का नजरिया उनके प्रति दया का नहीं, बल्कि ‘अपनत्व’ का होना चाहिए। प्रारंभिक कक्षाओं में ही इनकी पहचान कर इन्हें विशेष स्नेह के साथ जोड़ना हमारी प्राथमिकता है।”
RPWD एक्ट 2016 पर मंथन: कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दिव्यांगता की विभिन्न श्रेणियों और उनके कानूनी अधिकारों पर विस्तृत जानकारी दी।
होम-बेस्ड ट्रेनिंग: जो बच्चे गंभीर दिव्यांगता के कारण स्कूल नहीं आ सकते, उन्हें घर पर ही शिक्षा और सहायक सामग्री (Assistant Devices) मुहैया कराई जाएगी।
शिक्षकों की भूमिका: विशेष शिक्षकों (Special Educators) को ‘साधन सेवी’ के रूप में इस्तेमाल कर बच्चों की क्षमता निखारने की रणनीति बनी।
एडीपीओ मोनीदीपा बनर्जी और एपीओ एमलीन सुरीन ने स्पष्ट किया कि सूक्ष्म अवलोकन और मासिक संकुल बैठकों के जरिए ही इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
मिशन 2025-26: समाज को किया जागरूक इस कार्यशाला का असली मकसद समाज के हर तबके को यह समझाना था कि दिव्यांगता कोई अभिशाप नहीं है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए जिले ने लक्ष्य तय कर लिया है—हर बच्चा स्कूल में, हर बच्चा सम्मान के साथ।
कार्यक्रम में बीपीओ, बीआरपी, सीआरपी और बड़ी संख्या में अभिभावकों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि लोहरदगा अब समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश करने को तैयार है।





















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