
धार्मिक आस्था और वैदिक परंपराओं के संगम का भव्य दृश्य तब देखने को मिला, जब एक दिवसीय सामूहिक उपनयन संस्कार में 31 बटुकों ने यज्ञोपवीत धारण कर सनातन संस्कारों की राह पर पहला आध्यात्मिक कदम बढ़ाया। मंत्रोच्चार, हवन-पूजन और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा, जबकि आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को संस्कृति और मूल्यों से जोड़ना रहा।
भव्य आयोजन और संस्कार की विधि
रतनपुर में स्थित महामाया देवी मंदिर परिसर के श्री सत्संग मंडप में समग्र ब्राह्मण परिषद् की बिलासपुर मातृशक्ति परिषद् इकाई द्वारा प्रदेश स्तरीय सामूहिक उपनयन संस्कार का आयोजन किया गया। जिलाध्यक्ष रमा दीवान और जिला सचिव अंजू शर्मा ने बताया कि शुभ मुहूर्त में 31 ब्राह्मण बटुकों को जनेऊ धारण करवाया गया। सनातन धर्म के सोलह संस्कारों में उपनयन संस्कार को विशेष महत्व प्राप्त है, जिसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है।
वैदिक परंपराओं के साथ सम्पन्न हुई पूरी प्रक्रिया
आचार्यों के निर्देशन में तेलमाटी, मंडपाच्छादन, हरिद्रालेपन, मातृका पूजन, मुंडन और अष्ट ब्राह्मण भोज जैसी परंपरागत विधियां पूरी की गईं। इसके बाद पलाश दंड धारण किए बटुकों को जनेऊ पहनाकर सूर्यनारायण का दर्शन कराया गया और कान में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई। संस्कार के पश्चात बटुकों ने “भवति भिक्षां देहि” कहकर भिक्षा ग्रहण की और नए वस्त्र धारण कर गाजे-बाजे के साथ उनकी प्रतीकात्मक बारात भी निकाली गई।
प्रदेशाध्यक्ष प्रमिला तिवारी और सचिव सजल तिवारी ने बताया कि उपनयन संस्कार का उद्देश्य बच्चों को वेदाध्ययन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़ना है। यह संस्कार जीवन को दिशा देने और व्यक्तित्व निर्माण का प्रतीक माना जाता है। प्रदेश उपाध्यक्ष सरोज तिवारी और संगठन विस्तार प्रमुख उमा शुक्ला के अनुसार, सामूहिक उपनयन संस्कार का यह पहला वर्ष है, जिसमें रायपुर, अंबिकापुर, कोरबा, जांजगीर-चांपा, सक्ती, पेन्ड्रा सहित कई जिलों से बटुक शामिल हुए।
वैदिक आचार्यों और सहयोगियों की रही सहभागिता
आचार्य पं. दुर्गा शंकर दुबे, पं. कपिल देव पांडेय, आचार्य डॉ. राजेन्द्र कृष्ण पांडेय, पं. दीपक दुबे, पं. महेन्द्र पांडेय समेत आठ ब्राह्मणों ने विधि-विधान संपन्न कराया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भावेश शुक्ला “पराशर”, श्वेता शर्मा और पं. श्रीकांत तिवारी ने किया, जबकि अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं व श्रद्धालुओं का विशेष सहयोग रहा। सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक चले इस आयोजन ने न केवल धार्मिक वातावरण को जीवंत किया, बल्कि नई पीढ़ी को सनातन संस्कारों से जोड़ने का सशक्त संदेश भी दिया।
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