एक मासूम बातचीत, एक भरोसा और फिर डर, धमकी व बदनामी का अंतहीन सिलसिला—डिजिटल युग में नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा कितनी जरूरी है, यह मामला उसकी भयावह तस्वीर पेश करता है। फोन पर शुरू हुई दोस्ती कब अपराध में बदल गई, पीड़िता और उसके परिवार को इसका एहसास तब हुआ, जब सब कुछ हाथ से निकल चुका था।
मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में बढ़ती ऑनलाइन दोस्ती जब बिना निगरानी के आगे बढ़ती है, तो वह कब अपराध का रूप ले लेती है—यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही एक गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां एक नाबालिग किशोरी को फोन के जरिए प्रेमजाल में फंसाकर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगा है।
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी-दरियाबाद थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी महिला ने पुलिस अधीक्षक को दिए गए शिकायती पत्र में बताया कि मऊ जिले के एक युवक ने करीब दो वर्ष पूर्व फोन के माध्यम से उसकी नाबालिग बेटी से संपर्क बनाया। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी और आरोपी किशोरी को बहला-फुसलाकर अपने प्रभाव में लेने लगा। महिला के अनुसार, मां की अनुपस्थिति में आरोपी युवक घर तक पहुंचने लगा और बेटी के साथ आपत्तिजनक हरकतें करने लगा। जब इसकी जानकारी मां को हुई, तो उसने युवक को फटकार लगाते हुए दोबारा ऐसा न करने की चेतावनी दी। इसके बावजूद आरोपी चोरी-छिपे किशोरी से संपर्क करता रहा। आरोप है कि अप्रैल माह में आरोपी युवक अपनी मां और दो बहनों के साथ किशोरी के घर पहुंचा और महिला की गैरमौजूदगी में किशोरी को जेवरात व नकदी के साथ अपने साथ ले गया। जब मां घर लौटी तो बेटी गायब थी। काफी खोजबीन के बाद भी कोई सुराग नहीं मिला।
कई दिनों बाद किशोरी को एक रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया गया, जहां से वह किसी तरह घर पहुंची। पीड़िता ने परिजनों को बताया कि आरोपी ने उसे अपने यहां रखकर कई दिनों तक दुष्कर्म किया और इस दौरान उसके अश्लील फोटो व वीडियो भी बना लिए। इतना ही नहीं, आरोपी ने किशोरी के नाम से फर्जी फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर आपत्तिजनक फोटो व वीडियो प्रसारित कर दिए। विरोध करने पर वह वीडियो वायरल करने की धमकी देता रहा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला ने पुलिस अधीक्षक से शिकायत की। एसपी के निर्देश पर पुलिस ने आरोपी युवक, उसकी मां और दो बहनों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। यह मामला न सिर्फ नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा, बल्कि अभिभावकों की सतर्कता और डिजिटल साक्षरता की जरूरत को भी उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर संवाद और निगरानी न होने से ऐसे अपराध बढ़ रहे हैं, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता है।





















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