Homeबिहारझारखंडदेश-विदेशमनोरंजनखेलक्राइमशिक्षाराजनीतिहेल्थराशिफल
---Advertisement---

पॉक्सो कानून: 95% मामलों में न्याय अधूरा, फिर भी बच्चों की पहचान सोशल मीडिया पर बेपरदा

---Advertisement---
WhatsApp Group Join Now

“एक साल में ट्रायल” का कानूनी वादा 4-5 साल में बदला; पहचान उजागर करने वालों पर कार्रवाई नदारद

न्यूज स्केल लाइव | विशेष विचार

लेखक: ऋतेश चन्द्र
पूर्व अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति (CWC); सदस्य, स्थायी लोक अदालत (PLA); बाल अधिकार एवं पॉक्सो कार्यकर्ता

हमारे लोकतंत्र में जब किसी कानून को विशेष उद्देश्यों और कठोर प्रावधानों के साथ गढ़ा जाता है, तो समाज उम्मीद करता है कि वह सबसे कमजोर तबके के लिए ढाल बनेगा। वर्ष 2012 में लागू ‘लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO Act) का मूल संकल्प था: बच्चों का सुरक्षित बचपन, भयमुक्त माहौल और त्वरित व संवेदनशील न्याय।

लेकिन एक दशक से अधिक बीतने के बाद NCRB और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों का विश्लेषण कड़वा सच सामने लाता है: व्यवस्था स्वयं अपने बनाए विधि-विधानों को कुचल रही है।

आंकड़ों के आईने में विफल होती व्यवस्था

पिछले पांच वर्षों (2020 से 2024) के आंकड़े (स्रोत: लेखक द्वारा दिए गए आंकड़े): 2020: 1,39,308 एफआईआर दर्ज; 1,24,977 मामले ट्रायल में पहुंचे; केवल 4,982 में दोषसिद्धि, यानी मात्र 4.0%। फैसले में औसतन 4.8 वर्ष लगे। 2021: 1,64,502 एफआईआर; 1,48,397 ट्रायल; 6,011 दोषसिद्धि (4.1%); औसत समय 4.6 वर्ष। 2022: 1,91,109 एफआईआर; 1,70,731 ट्रायल; 7,493 दोषसिद्धि (4.4%); औसत समय 4.3 वर्ष। 2023: 2,14,117 एफआईआर; 1,92,628 ट्रायल; 9,410 दोषसिद्धि (4.9%); औसत समय 4.1 वर्ष। 2024: 2,37,157 एफआईआर; 2,30,421 मामलों में विचारण, किंतु दोषसिद्धि सिर्फ 11,739 यानी 5.1%। फैसले का औसत समय आज भी 3.8 वर्ष है।

लेखक के अनुसार इन आंकड़ों का सीधा अर्थ है कि अदालतों में लंबित मामलों का पहाड़ खड़ा है और लगभग 95% मामलों में या तो अपराधी छूट रहे हैं या पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा में टूट रहे हैं। सवाल उठता है कि जिस कानून में 100 में से 95 मामले मुकाम तक न पहुंचें, क्या वह अपराधियों के मन में खौफ पैदा कर सकता है?

अपने ही कानून की समय-सीमा तोड़ती व्यवस्था

पॉक्सो अधिनियम की धारा 35(1) के अनुसार बच्चे का साक्ष्य विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लेने के 30 दिनों के भीतर दर्ज किया जाना है। धारा 35(2) स्पष्ट कहती है कि संज्ञान की तारीख से एक वर्ष के भीतर ट्रायल पूरा होना चाहिए। फिर 4 से 5 साल क्यों लग रहे हैं? न्यायालय संसद द्वारा तय वैधानिक समय-सीमा की अनदेखी क्यों कर रहा है?

लचर पुलिस जांच, फॉरेंसिक रिपोर्टों में महीनों की देरी, तारीख-पर-तारीख की परंपरा और सुस्त कार्यशैली के कारण गवाह मुकर जाते हैं, साक्ष्य धुंधले पड़ते हैं और अपराधी अंततः साक्ष्यों के अभाव में बरी हो जाता है। ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है’, यह उक्ति पॉक्सो मामलों में हर दिन सच साबित हो रही है। जब तक जांच अधिकारियों, लोक अभियोजकों और पीठासीन न्यायिक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, विशेष अदालतें केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।

सोशल मीडिया पर तार-तार होती बच्चों की गरिमा

न्यायिक देरी जहां बच्चे को मानसिक आघात देती है, वहीं डिजिटल दुनिया में ‘सहानुभूति’ और ‘वायरल कंटेंट’ के नाम पर पीड़ितों की पहचान उजागर करने की होड़ मची है। कानून की नजर में यह गंभीर अपराध है, फिर भी यह सर्वत्र हो रहा है:

1. पॉक्सो अधिनियम, धारा 23: मीडिया, प्रेस या डिजिटल प्लेटफॉर्म द्वारा बच्चे की पहचान (नाम, पता, तस्वीर, स्कूल, परिवार या कोई भी पहचान उजागर करने वाला विवरण) प्रकट करने पर पूर्ण प्रतिबंध है। उल्लंघन पर 6 माह से 1 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। लेखक का कहना है कि मीडिया में यह आम है, पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई।

2. किशोर न्याय (JJ) अधिनियम, धारा 74: बच्चे की पहचान मीडिया में उजागर करने पर रोक और दंड का प्रावधान।

3. भारतीय न्याय संहिता (BNS), धारा 72 (पूर्ववर्ती IPC धारा 228A): यौन हिंसा की पीड़िता की पहचान उजागर करने पर 2 वर्ष तक कारावास और जुर्माना।

इसके बावजूद ‘व्यूज’ और ‘फॉलोअर्स’ के भूखे स्वयंभू कंटेंट क्रिएटर्स एफआईआर दर्ज होते ही पीड़ित बच्चे का वीडियो, रोते परिजनों के बयान और पहचान उजागर करने वाली सामग्री धड़ल्ले से प्रसारित करते हैं।

मंत्रालयों की चुप्पी, नियामकों की विफलता

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल हैं। केवल एडवाइजरी जारी करने या आईटी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियमों के कागजी प्रावधानों से बच्चों की अस्मिता की रक्षा नहीं हो सकती।

जब कानून बच्चों की पहचान छुपाना अनिवार्य बनाता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वतः संज्ञान लेकर ऐसा कंटेंट हटाने का सख्त और तत्काल तंत्र क्यों नहीं है? सरकार को दंड के साथ-साथ त्वरित क्रियात्मक (Operational Action) कदम उठाने होंगे:

1. जो क्रिएटर किसी बाल पीड़ित की तस्वीर, वीडियो या पहचान उजागर करे, उसका अकाउंट तत्काल प्रभाव से स्थायी रूप से फ्रीज या बैन किया जाए।

2. उसकी डिजिटल पहचान (IP/डिवाइस स्तर पर) ब्लैकलिस्ट की जाए और मोनेटाइजेशन पर आजीवन रोक लगाई जाए।

3. Meta, X, YouTube जैसे मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म पर यह बाध्यता हो कि 2 घंटे के भीतर ऐसा कंटेंट नहीं हटाया गया तो उन पर भारी वित्तीय पेनाल्टी लगाई जाएगी।

निष्कर्ष

पॉक्सो केवल दंड विधान नहीं है; यह हमारे देश के भविष्य, यानी हमारे बच्चों की सुरक्षा का राष्ट्रीय संकल्प है। जब तक अदालतों में मुकदमों का निपटारा कानूनन तय एक वर्ष में नहीं होगा और जब तक डिजिटल स्पेस में मर्यादा लांघने वालों पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक न्याय के आंकड़े ऐसे ही 4-5% पर सिमटे रहेंगे।

न्यायपालिका को अपनी ही प्रक्रिया की आत्म-समीक्षा करनी होगी और सरकार को सोशल मीडिया के बेलगाम रवैये पर सख्ती करनी होगी। बच्चों की अस्मिता और समयबद्ध न्याय पर कोई समझौता नहीं हो सकता, क्योंकि जिस राष्ट्र में बचपन असुरक्षित और न्याय लाचार हो, उसका भविष्य कभी सबल नहीं हो सकता।

हर खबर, हर विचार, सबसे पहले सिर्फ न्यूज स्केल लाइव पर।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment