45 बार रक्तदान कर चुके समाजसेवी का लक्ष्य वैष्णो देवी धाम तक पहुंचकर प्रेम, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता का संदेश फैलाना
प्रतापपुर (चतरा)। संवाददाता
जब अधिकांश लोग सुविधाओं से भरा जीवन जीने की चाह रखते हैं, ऐसे समय में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के साहेबगंज थाना क्षेत्र के जगदीशपुर गांव निवासी 35 वर्षीय राजा बाबू ने समाज सेवा, विश्व कल्याण और राष्ट्रीय एकता का संदेश देने के लिए लगभग 10 हजार किलोमीटर की पदयात्रा का संकल्प लिया है। हाथ में तिरंगा, कंधे पर बैग, तन पर पीले वस्त्र और मन में मानव सेवा का भाव लिए वे माता वैष्णो देवी धाम की ओर पैदल यात्रा कर रहे हैं।

राजा बाबू ने बताया कि उनकी यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में प्रेम, भाईचारा, सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करना इसका मुख्य उद्देश्य है। उनका कहना है कि जब तक समाज में मानवता और आपसी सद्भाव कायम रहेगा, तब तक देश निरंतर विकास के पथ पर आगे बढ़ता रहेगा।
अब तक 800 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी
6 जून को अपने गांव से यात्रा शुरू करने वाले राजा बाबू अब तक करीब 800 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने मां मंगला गौरी, विष्णुपद मंदिर, सीताकुंड, मां कालेश्वरी, चौमुखी महादेव तथा रजरप्पा स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर सहित कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन किए हैं।

आगे उनकी यात्रा डाल्टनगंज, अमरकंटक शक्तिपीठ, उज्जैन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, शिरडी साईं बाबा, शनि शिंगणापुर, पुष्कर शक्तिपीठ, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर होते हुए माता वैष्णो देवी धाम तक पहुंचेगी।
45 बार कर चुके हैं स्वैच्छिक रक्तदान
राजा बाबू केवल पदयात्री ही नहीं, बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र में भी एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं। महज 35 वर्ष की आयु में वे 45 बार स्वैच्छिक रक्तदान कर चुके हैं। उनका कहना है कि किसी जरूरतमंद को रक्त देकर जीवन बचाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं हो सकता और यही सेवा भावना उनकी यात्रा की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

प्रतापपुर में हुआ भव्य स्वागत
शनिवार, 28 जून को प्रतापपुर पहुंचने पर स्थानीय युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने फूल-मालाओं से उनका भव्य स्वागत किया। लोगों ने उनके साहस, सेवा भावना और राष्ट्रप्रेम की सराहना करते हुए कहा कि आज के दौर में हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर समाज को मानवता और भाईचारे का संदेश देना अपने आप में अनुकरणीय कार्य है।
राजा बाबू ने आगे बढ़ने से पहले एक बार फिर अपना संदेश दोहराया—“भारत एक, संविधान एक और सबको मिले सम्मान एक।” इसके बाद वे अपनी अगली मंजिल की ओर रवाना हो गए। उनकी यह पदयात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि विश्व कल्याण, मानव सेवा, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का एक सशक्त अभियान बन चुकी है, जो युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत साबित हो रही है।



















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