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मानवता शर्मसार: ‘मिशन वात्सल्य’ की उड़ी धज्जियां; 15 दिनों से बेड़ियों में जकड़ी मासूम के लिए नहीं जागा प्रशासन, सिस्टम की संवेदनहीनता चरम पर

On: April 17, 2026 5:51 PM
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प्रखंड मुख्यालय और संस्थानों के पास बेड़ियों में भटकती रही बच्ची, बाल संरक्षण की तमाम सरकारी योजनाएं प्रतापपुर में साबित हुईं ‘कागजी’

प्रतापपुर (चतरा): चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड मुख्यालय में पिछले दो हफ्तों से मानवता को शर्मसार करने वाला दृश्य दिखाई दे रहा है। करीब 12 वर्ष की एक मासूम किशोरी, जिसके पैरों में लोहे की बेड़ियाँ जकड़ी हुई हैं, लावारिस हालत में भटक रही है। यह स्थिति तब है जब केंद्र और राज्य सरकार द्वारा किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम एवं आदर्श नियमों के तहत बाल संरक्षण के लिए करोड़ों की योजनाएं और कड़े कानूनी कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।

संस्थानों के नाक के नीचे कानून का मखौल

अत्यंत चिंताजनक पहलू यह है कि यह किशोरी प्रखंड कार्यालय, पंचायत सचिवालय और कस्तूरबा आवासीय विद्यालय जैसे महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों के इर्द-गिर्द घूम रही है। इन संस्थानों की उपस्थिति के बावजूद किसी भी जिम्मेदार अधिकारी का ध्यान इस बच्ची की ओर न जाना जिला प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होने वाली यह बच्ची भूख-प्यास से तड़प रही है और फटे कपड़ों में बेड़ियों के साथ चलने को मजबूर है।

चाइल्ड हेल्पलाइन का गैर-जिम्मेदाराना रुख

व्यावसायिक संघ के अध्यक्ष गौतम कुमार की सूचना पर जब पत्रकार सतीश पांडेय ने 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन को मामले की जानकारी दी, तो सिस्टम की लाचारी और संवेदनहीनता खुलकर सामने आ गई। हेल्पलाइन ने अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभाने के बजाय शिकायतकर्ता को ही बच्ची को उनके पास लाने का निर्देश दे दिया। यह किशोर न्याय अधिनियम के उन प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है, जो संकट में फंसे बच्चों के तत्काल रेस्क्यू और पुनर्वास की जिम्मेदारी प्रशासन को सौंपते हैं।

बाल संरक्षण योजनाओं की विफलता

सरकार द्वारा संचालित ‘बाल संरक्षण कार्यक्रम’ का मूल उद्देश्य ऐसे ही असहाय और ‘देखभाल की आवश्यकता वाले बच्चों’ (CNCP) को सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन प्रतापपुर में:

  • आदर्श नियमों की अनदेखी: नियमों के तहत लावारिस बच्चों को 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष पेश करना अनिवार्य है।

  • प्रशासनिक उदासीनता: इतने महत्वपूर्ण संस्थानों के बीच एक मासूम का बेड़ियों में भटकना दर्शाता है कि धरातल पर बाल संरक्षण इकाइयां निष्क्रिय हैं।

सुरक्षा पर गहराते सवाल

स्थानीय ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी रोष और चिंता है कि यदि समय रहते बच्ची को सुरक्षित स्थान पर नहीं पहुँचाया गया, तो कोई बड़ी अनहोनी हो सकती है। क्षेत्रवासियों ने जिला प्रशासन से अविलंब हस्तक्षेप करने और दोषी विभागों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

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