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आस्था का विराट स्वरूप: क्यों अलग पहचान रखता है हजारीबाग का रामनवमी जुलूस?

On: March 23, 2026 12:04 PM
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सदी पुरानी परंपरा, 16 किलोमीटर लंबा मार्ग और 36 घंटे तक चलने वाला अनोखा जुलूस—जानिए पूरी कहानी

News Scale Live Desk | हजारीबाग : आस्था का ऐसा रूप, जो समय के साथ और विशाल होता गया
झारखंड के हजारीबाग में निकलने वाला रामनवमी जुलूस आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है।यह जुलूस अपने स्वरूप, अवधि और भागीदारी के कारण देश के अन्य आयोजनों से अलग पहचान रखता है। खास बात यह है कि जब देश के अधिकांश हिस्सों में रामनवमी का उत्सव समाप्त हो जाता है, उसी समय यहां इसकी शुरुआत होती है।

समय और स्वरूप—दोनों में अनोखा

हजारीबाग का रामनवमी जुलूस कई मायनों में विशिष्ट है। करीब 16 किलोमीटर लंबे मार्ग पर चलने वाला यह जुलूस 36 घंटे से भी अधिक समय तक निरंतर चलता रहता है। नवमी से आरंभ होकर यह दशमी और एकादशी तक जारी रहता है। इस दौरान लगभग 5 लाख से अधिक श्रद्धालु, अलग-अलग अखाड़ों और समूहों के रूप में इसमें शामिल होते हैं। हर उम्र और वर्ग के लोगों की सहभागिता इस आयोजन को एक जनउत्सव में बदल देती है।

शुरुआत: एक छोटे प्रयास से विशाल परंपरा तक

इस भव्य जुलूस की नींव वर्ष 1918 में रखी गई थी। स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर और उनके साथियों—हीरालाल महाजन, टीभर गोप, कन्हाई गोप, जटाधर बाबू और यदुनाथ—ने मिलकर कुम्हारटोली से इस परंपरा की शुरुआत की। उस समय यह आयोजन बेहद सादा था—एक महावीरी झंडा, प्रसाद का थाल और दो ढोल के साथ श्रद्धालु भगवान राम के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते थे। लेकिन यही साधारण शुरुआत आगे चलकर एक विशाल सांस्कृतिक धरोहर में बदल गई।

अखाड़ा परंपरा और पुरानी झलक

प्रारंभिक दौर में जुलूस का एक खास स्वरूप था। गोधुली बेला में सभी झंडे बड़ा अखाड़ा में एकत्र होते थे, जहां से 40-50 फीट ऊंचे झंडों के साथ जुलूस निकलता था। बड़ा बाजार होते हुए यह कर्जन मैदान तक पहुंचता था, जहां लाठी खेल जैसे पारंपरिक प्रदर्शन होते थे। इसके बाद सभी समूह अपने-अपने क्षेत्रों में लौट जाते थे। यह परंपरा उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा थी।

आजादी के बाद बढ़ा विस्तार

1947 तक यह जुलूस केवल नवमी के दिन तक सीमित था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसका विस्तार तेजी से हुआ। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग इसमें शामिल होने लगे। समय के साथ यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और सामूहिक पहचान का माध्यम भी बन गया।

बदलते दौर के साथ बदलती धुन

जुलूस के संगीत और प्रस्तुति में भी समय के साथ बदलाव देखने को मिला। पहले जहां पारंपरिक गाजा-बाजा का उपयोग होता था, वहीं बाद में बंगाल की ताशा पार्टियों ने इस आयोजन में नई ऊर्जा भर दी। करीब 100 से अधिक ताशा दल यहां आने लगे, जिससे इसकी पहचान क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर तक पहुंच गई। हाल के वर्षों में डीजे संस्कृति का प्रभाव भी देखा गया, लेकिन अब फिर से पारंपरिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने की कोशिशें हो रही हैं।

अविराम यात्रा: नवमी से एकादशी तक

आज यह जुलूस इतना विस्तृत हो चुका है कि यह एक दिन में समाप्त नहीं होता। नवमी से शुरू होकर यह दशमी और एकादशी तक चलता रहता है। पिछले कुछ वर्षों में यह जुलूस एकादशी की रात तक सड़कों पर सक्रिय रहता है। इसका समापन जामा मस्जिद के रास्ते से होकर होता है, जो इस आयोजन के सामाजिक सौहार्द और समावेशिता को भी दर्शाता है।

स्थानीय से वैश्विक पहचान तक

समय के साथ हजारीबाग का रामनवमी जुलूस एक स्थानीय आयोजन से निकलकर राष्ट्रीय और अब अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर चुका है। इसे “इंटरनेशनल रामनवमी” के रूप में भी देखा जाने लगा है। साथ ही, इसे राजकीय पर्व का दर्जा देने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है, जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता और महत्व को दर्शाती है।

एक सदी पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, बल्कि पहले से कहीं अधिक व्यापक हो चुकी है। हजारीबाग का रामनवमी जुलूस इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक छोटा सा सांस्कृतिक प्रयास समय के साथ लाखों लोगों की आस्था और पहचान का प्रतीक बन सकता है। यह केवल एक जुलूस नहीं, बल्कि परंपरा, एकता और सांस्कृतिक निरंतरता की जीवंत कहानी है।

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