“मन्नत पूरी होने का दिव्य संकेत: उड़हुल का फूल और माँ अष्टभुजी की अटूट आस्था!” “क्या आपने कभी ऐसा मंदिर देखा है, जहाँ आपकी प्रार्थना का जवाब, कोई इंसान नहीं, बल्कि साक्षात माँ अपने दिव्य संकेत से देती हैं?
केरेडारी (हजारीबाग): झारखंड की धरती अपने भीतर न जाने कितने अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। इन्हीं में से एक है हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड में स्थित सुप्रसिद्ध माँ अष्टभुजी का मंदिर। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘सिद्धिपीठ’ है जहाँ भक्तों की प्रार्थना का उत्तर साक्षात माँ के संकेतों से मिलता है। साप्ताहिक न्यूज़ स्केल की इस विशेष पड़ताल में हम आपको रूबरू कराएंगे इस मंदिर के उन चमत्कारों से, जो आज के आधुनिक युग में भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।
मन्नत का दिव्य संकेत: जब खुद गिरता है फूल
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का ‘पुष्प संकेत’ है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यदि कोई भक्त सच्चे मन से मन्नत मांगता है और पूजा के दौरान माँ के दाहिने अंग पर चढ़ाया गया लाल उड़हुल का फूल स्वतः नीचे गिर जाए, तो उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूर्ण होती है। यह दिव्य संकेत पाने के लिए भक्त घंटों तक माता की प्रतिमा के समक्ष टकटकी लगाए बैठे रहते हैं।
रहस्यमयी कुआँ: विज्ञान के लिए एक चुनौती
मंदिर परिसर में स्थित एक प्राचीन कुआँ कौतूहल का मुख्य केंद्र है। स्थानीय ग्रामीणों और पुजारियों के अनुसार, इस कुएँ का जलस्तर दुनिया के अन्य जलस्रोतों के विपरीत व्यवहार करता है। जहाँ मानसून में भारी बारिश के दौरान कुएँ लबालब भर जाते हैं, वहीं इस कुएँ का पानी बरसात में काफी गहराई में चला जाता है। इसके विपरीत, भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड में पानी का स्तर अपने आप ऊपर आ जाता है। यह रहस्य आज भी भू-गर्भ शास्त्रियों के लिए एक पहेली बना हुआ है।
300 साल पुराना इतिहास और स्वप्न की गाथा
मंदिर के मुख्य पुजारी उमेश पाठक बताते हैं कि करीब तीन सदी पहले उनके पूर्वजों को स्वप्न में माँ अष्टभुजी के दर्शन हुए थे। उस समय यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था। स्वप्न के आधार पर जब वे चिह्नित स्थान पर पहुँचे, तो वहाँ दीमकों का एक बड़ा ढेर (बांबी) मिला। जब उस स्थान की सफाई की गई, तो माँ की अलौकिक प्रतिमा प्रकट हुई। शुरुआत में लकड़ी के छप्पर से शुरू हुई पूजा आज एक भव्य मंदिर का रूप ले चुकी है।
अजेय प्रतिमा: हिलाई नहीं जा सकी जड़ें
एक समय ऐसा भी आया जब भक्तों ने माता की प्रतिमा को ऊंचे सिंहासन पर विराजमान करने का निर्णय लिया। इसके लिए प्रतिमा के नीचे खुदाई शुरू की गई। जानकार बताते हैं कि 25 से 30 फीट तक गहरा गड्ढा खोदने के बाद भी प्रतिमा का अंत नहीं मिला। अंततः हार मानकर और इसे दैवीय इच्छा समझकर खुदाई रोक दी गई। माँ आज भी अपने उसी मूल स्थान पर विराजमान हैं।
बदलाव की बयार: बलि प्रथा का अंत
पुराने समय में यहाँ बकरे की बलि देने की परंपरा थी। लेकिन एक ‘मौनी बाबा’ के आगमन और उनके आध्यात्मिक प्रभाव के कारण इस प्रथा को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। आज यह मंदिर पूर्णतः सात्विक और शांति का केंद्र है। यहाँ नए वाहनों की पूजा, बच्चों का मुंडन और नव-विवाहित जोड़ों का आशीर्वाद लेना एक अनिवार्य परंपरा बन गई है।
माँ अष्टभुजी का यह दरबार आस्था, विश्वास और कौतूहल का अद्भुत संगम है। यदि आप भी शांति और दैवीय अनुभव की तलाश में हैं, तो केरेडारी की यह सिद्धपीठ एक बार अवश्य दर्शनीय है।
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