राजधानी और आसपास के इलाकों में बच्चा चोरी की अफवाहें अब डरावनी हकीकत का रूप लेती दिख रही हैं। कहीं मासूमों के गायब होने का रहस्य है, तो कहीं अफवाह के नाम पर निर्दोष लोग भीड़ के निशाने पर हैं। सवाल बड़ा है — क्या सच में गिरोह सक्रिय है या डर ने समाज को हिंसक बना दिया है?
पटना। राजधानी पटना और आसपास के इलाकों—बिहटा व पुनपुन—में बच्चा चोरी की अफवाहों ने खतरनाक रूप ले लिया है। कई जगहों पर भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया, जिससे निर्दोष लोगों की जान पर बन आई। बिहटा के पतसा गांव में एक युवक को बच्चा चोर समझकर भीड़ ने बेरहमी से पीट दिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पुलिस को मौके पर पहुंचकर युवक को भीड़ के चंगुल से बचाना पड़ा।
वहीं पुनपुन क्षेत्र में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला को बच्चा चोर समझकर बंधक बना लिया गया। कैमूर जिले के पुसौली में भी एक महिला पर तरबूज देकर बच्चों को बहलाने का आरोप लगाकर उसे लहूलुहान कर दिया गया। पुलिस प्रशासन लगातार लोगों से अपील कर रहा है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और किसी भी संदिग्ध स्थिति में तुरंत पुलिस को सूचना दें, लेकिन घटनाओं की बढ़ती संख्या ने आम जनता में भय और अविश्वास का माहौल बना दिया है।
पटना से 76 बच्चे लापता
बिहार पुलिस की ताजा रिपोर्ट ने राजधानी के अभिभावकों की चिंता और बढ़ा दी है। पिछले एक वर्ष में केवल पटना जिले से 76 बच्चे रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुए हैं। इनमें 60 बच्चियां और 16 बच्चे शामिल हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अब तक केवल 8 बच्चों को ही बरामद किया जा सका है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्य में बच्चा चोरी या मानव तस्करी से जुड़े गिरोह सक्रिय हो सकते हैं, जबकि प्रशासन के सामने गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।
पुलिस ने लोगों से संयम बरतने और किसी भी अफवाह पर प्रतिक्रिया देने से पहले सत्यापन करने की अपील की है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। बढ़ती अफवाहों और वास्तविक लापता मामलों के बीच जनता में असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है। प्रशासन के लिए यह दोहरी चुनौती है—एक ओर बच्चों की सुरक्षित बरामदगी, तो दूसरी ओर अफवाहों से उपजी भीड़ हिंसा पर नियंत्रण।





















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