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महज पूछताछ के लिए गिरफ्तारी नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

On: February 8, 2026 1:30 AM
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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने एक अहम टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को सिर्फ पूछताछ के लिए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी द्वारा की जाने वाली गिरफ्तारी केवल एक वैधानिक विवेकाधिकार है, न कि अनिवार्य प्रक्रिया।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत गिरफ्तारी की शक्ति को पुलिस की सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि कठोर वस्तुनिष्ठ आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में भी गिरफ्तारी तभी हो सकती है, जब जांच संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लिए बिना प्रभावी ढंग से आगे न बढ़ सके। पीठ ने कहा, “इसका यह अर्थ नहीं है कि पुलिस अधिकारी महज पूछताछ करने के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए जब यह बिल्कुल आवश्यक हो। इसके विपरीत कोई भी व्याख्या बीएनएसएस, 2023 की धारा 35(1)(ख) और धारा 35(3) से 35(6) के उद्देश्य को विफल कर देगी।”

यह टिप्पणी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई के दौरान की गई। सुप्रीम कोर्ट इस प्रश्न पर विचार कर रहा था कि क्या बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना सात साल तक की सजा वाले सभी मामलों में अनिवार्य है। न्यायालय ने कहा कि इस धारा के तहत गिरफ्तारी सामान्य नियम नहीं बल्कि अपवाद है और पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह इस शक्ति का प्रयोग अत्यंत सतर्कता और संयम से करे। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या गिरफ्तारी वास्तव में आवश्यक है। न्यायालय के अनुसार, धारा 35(1)(बी)(i) के आदेश और धारा 35(1)(बी)(ii) में वर्णित कम-से-कम एक शर्त की पूर्ति के बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

जनवरी में पारित और हाल में वेबसाइट पर अपलोड किए गए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही गिरफ्तारी की परिस्थितियां मौजूद हों, फिर भी जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, गिरफ्तारी से बचा जाना चाहिए। न्यायालय ने दो टूक कहा कि गिरफ्तारी के बिना भी जांच जारी रह सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच की प्रक्रिया का उद्देश्य तथ्यों और परिस्थितियों का पता लगाना है, न कि अनावश्यक रूप से व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना। गिरफ्तारी जांच को आगे बढ़ाने का एक वैकल्पिक साधन है, जिसे हर मामले में अपनाना आवश्यक नहीं है।

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