कैलाशपति मिश्र का बोया बीज और सम्राट चौधरी का राजतिलक, जब 173 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी
समीक्षा: न्यूज स्केल डिजिटल डेस्क: बिहार की सत्ता के शीर्ष पर आज जो भगवा परचम लहरा रहा है, उसके पीछे साढ़े चार दशकों का अनवरत संघर्ष, हार का सन्नाटा और जीत की गूँज छिपी है। 1980 में जनसंघ की कोख से निकली भारतीय जनता पार्टी ने बिहार की जिस ‘बंजर’ जमीन पर संघर्ष शुरू किया था, आज सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही वह जमीन ‘पूरी तरह’ भाजपा की हो गई है। यह केवल एक मुख्यमंत्री का बदलना नहीं है, बल्कि बिहार में ‘नीतीश युग’ के अंत और ‘विशुद्ध भाजपाई युग’ का आधिकारिक शंखनाद है।
शुरुआती दौर: जब 173 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी
भाजपा के गठन के बाद कैलाशपति मिश्र, जिन्हें बिहार भाजपा का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता है, ने पार्टी को खड़ा करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। उस दौर का डेटा भाजपा की मुश्किल डगर को स्पष्ट करता है:
1980 का चुनाव: भाजपा ने 246 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 21 सीटें जीत सकी। 173 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।
1985 का चुनाव: स्थिति और बिगड़ी, 234 सीटों में से महज 16 सीटें मिलीं और 172 की जमानत जब्त हुई।
कांग्रेस के वर्चस्व वाले उस दौर में भाजपा के लिए बिहार की जमीन जीतना नामुमकिन सा लगता था, लेकिन कैलाशपति मिश्र की मेहनत ने कैडर को जीवित रखा।
लालू युग और सुशील मोदी का उदय
90 के दशक में जब कांग्रेस की पकड़ ढीली हुई और लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ, तब भाजपा की साख भी बढ़नी शुरू हुई। 1990 में भाजपा 39 सीटों पर पहुँची और 1995 में 41 सीटों तक। इसके बाद दौर आया सुशील कुमार मोदी का। सुशील मोदी ने लालू यादव के खिलाफ सड़क से सदन तक लड़ाई लड़ी। वर्ष 2000 का चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ, जहाँ भाजपा ने 67 सीटें जीतीं। यहीं से सुशील मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी ने आकार लेना शुरू किया, जिसने आगे चलकर बिहार की राजनीति को बदल दिया।
‘बॉस’ नीतीश और संघर्ष का नया दौर
सुशील मोदी ने व्यावहारिक राजनीति के तहत नीतीश कुमार को अपना ‘बॉस’ माना। इसके परिणाम स्वरूप:
2005 (अक्टूबर): भाजपा ने 102 सीटों पर लड़कर 55 सीटें जीतीं।
2010 (स्वर्ण काल): भाजपा ने 102 में से 91 सीटें जीतकर धमाकेदार प्रदर्शन किया।
लेकिन 2013 में जब नरेंद्र मोदी का नाम पीएम पद के लिए आगे आया, तो नीतीश कुमार अलग हो गए। नतीजा यह रहा कि 2015 में अकेले चुनाव लड़कर भाजपा 53 सीटों पर सिमट गई।
सम्राट चौधरी: भाजपा का नया चेहरा और पूर्ण नेतृत्व
2020 के चुनाव के बाद भाजपा ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया। सुशील कुमार मोदी को केंद्र की राजनीति में भेज दिया गया और बिहार में नए नेतृत्व की तलाश शुरू हुई। यहीं से सम्राट चौधरी का ग्राफ तेजी से बढ़ा।
| वर्ष/दौर | प्रमुख नेता | राजनीतिक स्थिति |
| 1980-2000 | कैलाशपति मिश्र | संगठन निर्माण और संघर्ष का दौर |
| 2000-2020 | सुशील मोदी | गठबंधन और उप-मुख्यमंत्री का दौर |
| 2023-2026 | सम्राट चौधरी | आक्रामक नेतृत्व और मुख्यमंत्री का पद |
सम्राट चौधरी, जो 2018 में भाजपा में आए थे, 2023 तक बिहार भाजपा की पहचान बन गए। 2025 के चुनाव में भाजपा की 89 सीटों पर जीत ने यह साबित कर दिया कि पार्टी का अपना जनाधार अब नीतीश कुमार पर निर्भर नहीं है।
उप-मुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री तक का सफर
आज सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा अब बिहार में ‘पिछलग्गू’ की भूमिका छोड़कर ‘नेतृत्व’ की भूमिका में आ चुकी है। 45 साल पहले कैलाशपति मिश्र ने जो सपना देखा था, सम्राट चौधरी के राजतिलक ने उसे हकीकत में बदल दिया है। बिहार की राजनीति अब मंडल और कमंडल के नए समीकरणों के साथ एक नए पथ पर अग्रसर है।
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