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विनोबा भावे विश्वविद्यालय में टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल

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मैनपावर और सिक्योरिटी सेवा की निविदा में देरी को लेकर छात्र मोर्चा ने मांगी उच्चस्तरीय जांच

हजारीबाग (झारखंड), न्यूज स्केल संवाददाता : झारखंड के हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय में मैनपावर एवं सिक्योरिटी सेवा से संबंधित टेंडर प्रक्रिया लंबे समय से लंबित रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। पूर्व में टेंडर जारी होने के बाद उसके निरस्त होने और प्रक्रिया के लंबे समय तक लंबित रहने की बात भी सामने आती रही है। ऐसे में मौजूदा टेंडर प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

झारखंड छात्र मोर्चा के अध्यक्ष चंदन सिंह ने कहा कि जिन सेवाओं के लिए निर्धारित अवधि के लिए निविदा जारी की जाती है, यदि उसी व्यवस्था को बार-बार आगे बढ़ाते हुए लंबे समय तक जारी रखा जाता है और नई निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो इसके कारणों की जांच होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि एक वर्ष के लिए निर्धारित टेंडर व्यवस्था किसी न किसी रूप में चार वर्ष से अधिक समय तक चलती रही है और नई निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को इसका कारण सार्वजनिक करना चाहिए। उनका कहना है कि बार-बार टेंडर जारी करना, प्रक्रिया लंबित रखना या बाद में उसे निरस्त करना पारदर्शिता से जुड़े सवाल खड़े करता है।

वर्तमान एजेंसी को सेवा विस्तार पर भी सवाल

चंदन सिंह ने कहा कि वर्तमान में कार्यरत एजेंसी को लगातार सेवा विस्तार दिए जाने से यह सवाल उठता है कि कहीं टेंडर प्रक्रिया में हो रही देरी से मौजूदा एजेंसी को अप्रत्यक्ष लाभ तो नहीं मिल रहा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी संस्था या कंपनी पर सीधा आरोप नहीं है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़ा सवाल है।

उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से मैनपावर एवं सिक्योरिटी टेंडर से संबंधित पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की। इसमें टेंडर जारी करने की तिथि, सेवा विस्तार के आदेश, टेंडर निरस्त किए जाने के कारण, तकनीकी एवं वित्तीय बोली की स्थिति तथा वर्तमान एजेंसी को दिए गए कार्यादेश और सेवा विस्तार से संबंधित दस्तावेज शामिल हैं।

दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग

चंदन सिंह का कहना है कि यदि पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि टेंडर प्रक्रिया में देरी किन कारणों से हुई और इससे विश्वविद्यालय को किसी प्रकार की वित्तीय अथवा प्रशासनिक क्षति हुई या नहीं।

उन्होंने कहा कि नई निविदा प्रक्रिया लंबित रहने के कारण पुरानी व्यवस्था को वर्षों तक जारी रखने की स्थिति नहीं बननी चाहिए। अब मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण और संबंधित दस्तावेज सामने आने के बाद ही टेंडर प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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