टांगीनाथ धाम की ऐतिहासिक–आध्यात्मिक विरासत पर शोध यात्रा, झारखंड की सनातन चेतना को समझने का प्रयास

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गुमला। झारखंड की प्राचीन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत टांगीनाथ धाम को समझने और उसके ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सनातनी महत्व का अध्ययन करने के उद्देश्य से झारखंड कला सांस्कृतिक शोध संस्थान, रंगमण्डल एवं नाट्य अकादमी के शोधार्थियों द्वारा एक विशेष शोध एवं अनुसंधान यात्रा संपन्न की गई। यह धाम चारों ओर नदी, पर्वत और प्राकृतिक वादियों से घिरा हुआ गुमला जिले के चैनपुर–डुमरी प्रखंड क्षेत्र में अवस्थित है।

इस शोध यात्रा में संस्थान के राष्ट्रीय सचिव सह निदेशक डॉ. दीपक प्रसाद के साथ सांस्कृतिक शोधकर्ता डॉ. रंजीत कुमार सिंह, प्रो. शिल्पी तथा डॉ. मंजूषा पूर्ति शामिल रहे। शोध दल ने टांगीनाथ धाम में समय व्यतीत करते हुए स्थल का सूक्ष्म अध्ययन किया।

शोधकर्ताओं ने मंदिर परिसर, प्राचीन शिवलिंगों, त्रिशूल (टांगी) तथा अन्य ऐतिहासिक अवशेषों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। साथ ही स्थानीय ग्रामीणों, पुजारियों एवं क्षेत्र के बुजुर्गों से संवाद कर टांगीनाथ धाम से जुड़ी लोकमान्यताओं, परशुराम तपःस्थली की परंपरा तथा मंदिर से संबंधित ऐतिहासिक कथाओं की जानकारी एकत्र की। यह अध्ययन झारखंड की सनातन सांस्कृतिक चेतना को वैज्ञानिक एवं शोधपरक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास रहा।

इस अवसर पर डॉ. दीपक प्रसाद ने कहा कि टांगीनाथ धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि झारखंड की आध्यात्मिक साधना, तपस्या और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत केंद्र है, जिसे अब तक अपेक्षित पहचान नहीं मिल पाई है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के शोध कार्यों के माध्यम से संस्थान झारखंड की उपेक्षित सांस्कृतिक धरोहरों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

उल्लेखनीय है कि झारखंड कला सांस्कृतिक शोध संस्थान द्वारा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में नियमित रूप से ऐसी शोध यात्राएँ आयोजित की जाती रही हैं, ताकि स्थानीय संस्कृति, इतिहास और परंपराओं का दस्तावेजीकरण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जा सके।

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