प्राक्कलन से काफी कम दर पर काम लेने की प्रवृत्ति से उठे सवाल, निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की मांग
मयूरहंड (चतरा)। जिले में सड़क, पुल-पुलिया, भवन समेत विभिन्न सरकारी निर्माण कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। योजनाओं की गुणवत्ता के लिए डीपीआर और प्राक्कलन तैयार किए जाते हैं, लेकिन निविदा में प्राक्कलित राशि से काफी कम दर पर काम लेने की प्रवृत्ति को लेकर निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
कम दर पर काम मिलने की स्थिति में सामग्री, मजदूरी और तकनीकी प्रक्रियाओं में कटौती की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार निर्माण के कुछ समय बाद ही सड़क उखड़ने, पुल-पुलिया में दरार और भवनों में खराबी जैसी स्थिति दिखने लगती है।
निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों के अनुसार, कम लागत का असर कुशल श्रमिकों, निर्माण सामग्री और तकनीकी कार्यों पर पड़ सकता है। इससे निर्माण की मजबूती और टिकाऊपन प्रभावित होने की आशंका रहती है। वहीं, निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं होने से सरकारी योजनाओं की लागत और उपयोगिता भी प्रभावित होती है।
निर्माण कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संवेदक के साथ संबंधित विभाग के अभियंताओं और निगरानी तंत्र की भी है। कार्य शुरू होने से लेकर सामग्री की जांच, तकनीकी मानकों के पालन और अंतिम भुगतान तक नियमित निगरानी जरूरी है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि केवल सबसे कम दर को आधार बनाने के बजाय संवेदक की तकनीकी क्षमता, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और नियमित स्थल निरीक्षण को भी गंभीरता से देखा जाए। समय से पहले निर्माण क्षतिग्रस्त होने पर संवेदक और निगरानी तंत्र की जिम्मेदारी तय की जाए, ताकि सरकारी धन की बर्बादी पर रोक लग सके।



















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