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उत्सव या उन्माद? डीजे संस्कृति पर उठे सवाल

On: February 27, 2026 1:07 AM
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प्रतापपुर (चतरा)। अवसर चाहे पूजा-पाठ का हो, शादी-विवाह का या जन्मदिन काकृआज डीजे बजाना जैसे अनिवार्य सामाजिक रस्म बन गया है। बिना डीजे के कोई भी आयोजन अधूरा समझा जाने लगा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्सव का अर्थ अब शोर, उन्माद और मर्यादा-भंग ही रह गया है? डीजे की तेज़ ध्वनि केवल कानों को ही नहीं, पूरे समाज को प्रभावित कर रही है। अत्यधिक साउंड से बुज़ुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों की सेहत पर सीधा असर पड़ता है। चिकित्सकों के अनुसार तेज आवाज़ से हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, मानसिक तनाव और सुनने की क्षमता में कमी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसके बावजूद न तो ध्वनि सीमा का पालन हो रहा है और न ही पड़ोसियों की सुविधा का ख्याल रखा जा रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब सार्वजनिक सड़कों को ही नाच-गाने का मंच बना दिया जाता है। शादी-ब्याह में बारात के दौरान सड़क पर घंटों डीजे बजते रहते हैं, जिससे यातायात बाधित होता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। कई बार अश्लील गीतों और उन्मादी धुनों पर खुलेआम नाच-गाना सामाजिक मर्यादा पर भी सवाल खड़े करता है। यह सोचने की जरूरत है कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश दे रहे हैं। क्या खुशी मनाने का मतलब नियम तोड़ना और दूसरों को परेशान करना है? या फिर आनंद और उत्सव को शालीनता व अनुशासन के साथ भी मनाया जा सकता है? समाज, प्रशासन और आयोजनकर्ताओंकृतीनों को आत्ममंथन करना होगा। डीजे पर नियंत्रण, निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन और सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासन का सख्ती से पालन आवश्यक है। खुशी मनाइए, लेकिन शालीनता और मर्यादा के साथ। उत्सव हो, उन्माद नहीं। परंपरा हो, तमाशा नहीं। वरना शोर तो गूंजेगा, लेकिन संस्कारों की आवाज़ कहीं दब कर रह जाएगी।

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