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उग्रवाद से पंचायत की राजनीति तक पहुंचा था बृजेश गंझू, निर्विरोध उपमुखिया भी बना

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राजनीति में रहा प्रभाव, 2015 में पंचायत समिति सदस्य चुना गया; माओवादी संगठन से अलग होकर टीएसपीसी के गठन में निभाई भूमिका

चतरा, संवाददाता। टीएसपीसी सुप्रीमो सरदार उर्फ बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोगता का नाम लंबे समय तक झारखंड के उग्रवादी घटनाक्रम से जुड़ा रहा। हालांकि, उसके जीवन का एक पक्ष ऐसा भी रहा, जब उसने लावालौंग प्रखंड की स्थानीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और पंचायत चुनाव के जरिए निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी बना।

2010 में निर्विरोध वार्ड सदस्य, फिर बना उपमुखिया

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2010 के पंचायत चुनाव के दौरान लावालौंग प्रखंड की राजनीति में बृजेश गंझू का प्रभाव देखने को मिला था। उस समय एक पंचायत को छोड़कर प्रखंड की अधिकांश पंचायतों में मुखिया, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में बृजेश गंझू भी निर्विरोध वार्ड सदस्य चुना गया था। बाद में वार्ड सदस्यों की सहमति से उसे उपमुखिया बनाया गया।

इसके बाद 2015 के पंचायत चुनाव में बृजेश गंझू पंचायत समिति सदस्य के रूप में निर्वाचित हुआ। हालांकि, उसके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच और एनआईए तथा पुलिस की कानूनी कार्रवाई के बाद उसकी पंचायत समिति सदस्यता रद्द कर दी गई।

विधानसभा चुनाव में भाई के पक्ष में किया था प्रचार

बृजेश गंझू की राजनीतिक सक्रियता का एक और पक्ष 2014 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा रहा। उस चुनाव में उसने सिमरिया विधानसभा सीट से झाविमो के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अपने बड़े भाई गणेश गंझू के पक्ष में प्रचार किया था। चुनाव में गणेश गंझू को जीत मिली थी। इसके बाद बृजेश की पहचान धीरे-धीरे स्थानीय राजनीति से अधिक उग्रवादी संगठन के प्रमुख चेहरे के रूप में होने लगी।

कम उम्र में माओवादी संगठन से जुड़ने का दावा

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, बृजेश गंझू ने किशोरावस्था में ही माओवादी संगठन से जुड़कर उग्रवादी गतिविधियों में प्रवेश किया था। बताया जाता है कि करीब 14 वर्ष की उम्र में वह माओवादी संगठन के बाल दस्ते से जुड़ा और बाद में संगठन में उसकी भूमिका बढ़ती गई।

वर्ष 1995 से 2000 के बीच उसके माओवादी संगठन से जुड़े रहने की बात कही जाती है। बाद में वैचारिक मतभेदों के चलते उसने अलग राह अपनाई और 2005 में टीएसपीसी के गठन में भूमिका निभाई। टीएसपीसी के गठन के बाद क्षेत्र में माओवादी संगठन और टीएसपीसी के बीच लंबे समय तक हिंसक संघर्ष चला। इसका प्रभाव चतरा सहित आसपास के कई जिलों में देखा गया।

कई जिलों में संगठन के विस्तार का दावा

वर्ष 2016-17 के बाद बृजेश के भूमिगत होकर संगठन को संचालित करने की बात सामने आती रही। उसके प्रभाव का क्षेत्र चतरा के अलावा हजारीबाग, कोडरमा, लातेहार, पलामू, गढ़वा, गुमला, लोहरदगा और रामगढ़ तक बताया गया। सरकार ने उसके खिलाफ दर्ज मामलों और उग्रवादी गतिविधियों को देखते हुए कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। इसमें झारखंड सरकार की ओर से 25 लाख और एनआईए की ओर से पांच लाख रुपये शामिल थे।

शिक्षा के क्षेत्र में कॉलेज खोलने की भी पहल

बृजेश गंझू के बारे में यह भी जानकारी सामने आती है कि उसने लावालौंग में जीएसबी इंटर कॉलेज की स्थापना की थी। बताया जाता है कि कॉलेज की शुरुआत वर्ष 2011-12 में हुई थी। इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र के उन छात्र-छात्राओं को आगे की शिक्षा का अवसर देना बताया गया, जो सातवीं-आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते थे। कॉलेज के माध्यम से विद्यार्थियों को इंटरमीडिएट स्तर तक पढ़ाई का अवसर मिलने लगा था। हालांकि, बाद में बृजेश के खिलाफ दर्ज मामलों, एनआईए की कार्रवाई और पुलिस की लगातार दबिश के बीच कॉलेज के संचालन पर भी असर पड़ा और अंततः यह बंद हो गया।

मुठभेड़ में मौत के बाद टीएसपीसी के भविष्य पर नजर

वाराणसी में यूपी एटीएस के साथ मुठभेड़ में बृजेश गंझू की मौत और टीएसपीसी के दूसरे प्रमुख कमांडर आक्रमण गंझू की गिरफ्तारी के बाद संगठन के पुराने नेतृत्व ढांचे को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी बढ़ गई है। अब सुरक्षा एजेंसियों के सामने संगठन से जुड़े बचे हुए सदस्यों, संपर्क सूत्रों और संभावित नए नेतृत्व की गतिविधियों पर नजर रखने की चुनौती है। चतरा समेत उन जिलों में भी निगरानी बढ़ाई जा रही है, जहां पूर्व में टीएसपीसी की गतिविधियां सामने आती रही हैं।

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