आहर की उड़ाही के दौरान निकली पाषाण मूर्ति; ASI के मूर्ति वैज्ञानिक ने की पुष्टि। ग्रामीणों का दावा— “निकालते समय प्रतिमा से लिपटे थे 3 सांप”, ऐतिहासिक धरोहर को देखने उमड़ा आस्था का महा-सैलाब, मंदिर निर्माण की तैयारी
मोक्ष और ज्ञान की भूमि गया जिले के टिकारी प्रखंड अंतर्गत चितौखर गांव से सनातन संस्कृति और भारतीय इतिहास को झकझोर देने वाली एक बेहद ही अलौकिक, विस्मयकारी और दुर्लभ खबर सामने आई है। यहाँ जल संचयन के लिए एक पुराने आहर (पारंपरिक तालाब) की उड़ाही यानी मिट्टी की खुदाई के दौरान कड़क पाषाण (पत्थर) से निर्मित एक अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ मूर्ति प्राप्त हुई है।
पुरातत्व विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के शुरुआती विधिक रडार के अनुसार, यह मूर्ति लगभग हजार वर्ष पुरानी ‘पालकालीन दुर्लभ पंचायतन शिवलिंग’ है। इस महा-खोज की सूचना जैसे ही फैली, समूचे मगध प्रमंडल में कौतूहल, धार्मिक उत्साह और गहरी श्रद्धा का वातावरण कायम हो गया है।
क्या है ‘पंचायतन शिवलिंग’? जानिए मूर्ति वैज्ञानिक डॉ० जलज तिवारी की प्रामाणिक व्याख्या:
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के सुप्रसिद्ध मूर्ति वैज्ञानिक डी० जलज कुमार तिवारी ने इस प्रतिमा का गहन विधिक और तकनीकी अवलोकन करने के बाद इसे ‘पंचायतन शिवलिंग’ की आधिकारिक संज्ञा दी है।
एक ही पाषाण खंड पर उकेरी गई इस महा-प्रतिमा की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
चतुर्भुज शिव और नृत्य गणेश: शिवलिंग के एक हिस्से पर स्वयं चतुर्भुज भगवान शिव उत्कीर्ण हैं, जबकि दूसरी ओर रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्रीगणेश अत्यंत सुंदर नृत्य मुद्रा में उकेरे गए हैं।
ईरानी शैली में सूर्य देव: सबसे चमत्कारी पहलू यह है कि मूर्ति में भगवान सूर्य देव को हार, ईरानी शैली के विशेष वस्त्र और जूते (बूट्स) पहने हुए दर्शाया गया है। उनके दोनों ओर उनके पारंपरिक सहचर ‘दंड’ और ‘पिंगल’ की कलाकृतियां भी स्पष्ट रूप से कड़क नक्काशी के साथ मौजूद हैं।
शंख और चक्र पुरुष संग विष्णु: भगवान विष्णु के चारों हाथ नीचे की ओर शंख पुरुष और चक्र पुरुष के सिर पर विधिक आशीर्वाद की मुद्रा में दर्शाए गए हैं।
“जब मिट्टी से निकली मूर्ति, तब लिपटे थे तीन सांप” : ग्रामीणों की आँखों देखा दिव्य कौतूहल
प्रत्यक्षदर्शियों और चितौखर गांव के स्थानीय ग्रामीणों ने एक बेहद चमत्कारी और आस्था से जुड़ी दास्तान का खुलासा किया है। पैक्स अध्यक्ष विजय नारायण सिंह और ग्रामीण सुनील शर्मा ने बताया कि आहर की सफाई और जेसीबी व कड़ाही से मिट्टी निकासी का कार्य चल रहा था, तभी मिट्टी के भीतर से यह भारी पत्थर बाहर आया।
ग्रामीणों का अटूट दावा है कि जब इस पाषाण विग्रह को पूरी तरह मिट्टी से बाहर निकाला गया, उस समय इस पवित्र शिवलिंग पर तीन जीवित सांप लिपटे हुए थे। घाट पर भारी भीड़ की हलचल और शोर-शराबा देखकर वे सांप बिना किसी को नुकसान पहुंचाए चुपचाप वहां से ओझल हो गए। इस अलौकिक दृश्य को देखकर ग्रामीणों की धार्मिक आस्था सातवें आसमान पर पहुंच गई और लोगों ने तुरंत हर-हर महादेव के जयकारों के साथ बेलपत्र, फूल और गंगाजल से प्रतिमा की विधिक पूजा-अर्चना शुरू कर दी।
मां तारा नगरी ‘केसपा’ की प्रतिमा से मिलता है इतिहास; सुजीत झा का बड़ा इनपुट
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु शेखर ने इस ऐतिहासिक प्रतिमा के चित्र विख्यात पुरातत्वविद सुजीत झा को भेजे। पुरातत्वविद सुजीत झा ने इस खोज को भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का एक अनुपम विधिक प्रमाण बताते हुए बड़ा ऐतिहासिक खुलासा किया:
“इस अद्भुत प्रतिमा में भगवान सूर्य के दोनों ओर बेहद सुंदर कमल के फूल बने हैं और हाथ में पद्म है. ठीक इसी प्रकार की दुर्लभ और विशिष्ट सूर्य प्रतिमा गया के ही ऐतिहासिक ‘मां तारा नगरी केसपा ग्राम’ में भी प्राचीन काल से स्थापित है. इससे प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल में यह पूरा टिकारी क्षेत्र किसी बहुत बड़े बौद्ध या सनातनी धार्मिक साम्राज्य का मुख्य केंद्र रहा होगा.”
आहर के समीप बनेगा भव्य मंदिर; दीनानाथ और संटू प्रसाद ने दी जानकारी
गांव के प्रबुद्ध नागरिक दीनानाथ कुमार, संटू प्रसाद सहित सैकड़ों ग्रामीणों ने न्यूज़ स्केल लाइव से बात करते हुए बताया कि इस ऐतिहासिक और चमत्कारी धरोहर को गांव से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि जिस आहर (तालाब) से बाबा प्रकट हुए हैं, ठीक उसी के समीप एक भव्य और कलात्मक मंदिर का निर्माण कराया जाएगा और इस पंचायतन शिवलिंग को पूरे वैदिक विधि-विधान और विधिक अनुष्ठान के साथ वहां स्थापित किया जाएगा।
फिलहाल, इस अनमोल पालकालीन ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने और इसके आगे के कार्बन-डेटिंग अनुसंधान के लिए जिला प्रशासन और एएसआई की टीम लगातार चितौखर गांव के स्थानीय विंग के साथ संपर्क बनाए हुए है।





















Total Users : 1007194
Total views : 2782300