*किसानों की बदहाली पर फूटा जनाक्रोश, युवा समाजसेवी रामाधार पाठक ने सरकार और कृषि मंत्री को घेरा*
*“सब्जियों के कारोबार से भर रही बिचौलियों की जेब, किसानों के हाथ अब भी खाली”*
रांची/रामगढ़ :राज्य में किसानों की बदहाल स्थिति को लेकर युवा समाजसेवी रामाधार पाठक ने झारखंड सरकार और कृषि विभाग पर तीखा हमला बोला है। हाल ही में प्रकाशित खबरों में किसानों की फसल औने-पौने दामों में बिकने और बिचौलियों द्वारा भारी मुनाफा कमाने की सच्चाई सामने आने के बाद उन्होंने कहा कि आज झारखंड का किसान सबसे ज्यादा उपेक्षित और शोषित वर्ग बन चुका है।
रामाधार पाठक ने कहा कि अखबारों में छपी तस्वीरें और रिपोर्टें सरकार के उन दावों की पोल खोल रही हैं, जिनमें किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने की बातें कही जाती हैं। हकीकत यह है कि किसान खेत में खून-पसीना बहा रहा है, लेकिन कमाई का बड़ा हिस्सा बिचौलियों और व्यापारियों की जेब में जा रहा है।
उन्होंने मशहूर शायर अल्लामा इकबाल की पंक्तियों का जिक्र करते हुए कहा—
“जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोटी,
उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो।”
रामाधार पाठक ने कहा कि यह पंक्तियां आज झारखंड के किसानों की वास्तविक स्थिति को दर्शाती हैं। किसान डीजल, खाद, बीज, मजदूरी और सिंचाई पर हजारों रुपये खर्च कर खेती करता है, लेकिन बाजार में उसे लागत का उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता। दूसरी ओर बिचौलिये वही सब्जियां और अनाज शहरों में कई गुना कीमत पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।
उन्होंने कृषि मंत्री पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि यदि कृषि विभाग सही तरीके से काम कर रहा होता तो किसानों को अपनी उपज सड़कों पर फेंकने या मिट्टी के भाव बेचने की नौबत नहीं आती। गांवों में आज भी कोल्ड स्टोरेज, सरकारी खरीद केंद्र और बेहतर बाजार व्यवस्था का अभाव है। कृषि मंत्री सिर्फ बैठकों और घोषणाओं तक सीमित हैं, जबकि किसान आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
रामाधार पाठक ने कहा कि सरकार को किसानों के नाम पर राजनीति बंद कर अब जमीन पर काम करना चाहिए। उन्होंने मांग की कि राज्य में सब्जियों एवं अनाज की सरकारी खरीद सुनिश्चित की जाए, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी मिले, हर प्रखंड में कोल्ड स्टोरेज बनाया जाए और डीजल-सिंचाई पर विशेष सब्सिडी दी जाए।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसानों की समस्याओं पर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में किसानों का आक्रोश आंदोलन का रूप ले सकता है।
अंत में रामाधार पाठक ने कहा,
“जब अन्नदाता ही परेशान रहेगा, तब विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे। किसान बचेगा तभी गांव बचेगा, और गांव बचेगा तभी देश मजबूत होगा।”




















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