गोमे गांव की रुला देने वाली तस्वीर, संपन्न लोगों को मिला आवास योजना का लाभ, किशोर न्याय अधिनियम और ‘मिशन वात्सल्य’ की उड़ रही धज्जियां
प्रतापपुर (चतरा) | विकास और कल्याणकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड क्षेत्र से प्रशासनिक तंत्र को शर्मसार करने वाली एक अत्यंत दर्दनाक तस्वीर सामने आई है। गोमे गांव में एक अत्यंत गरीब परिवार घोर बदहाली और बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर है। परिवार के मुखिया का कुछ वर्ष पूर्व बीमारी के कारण निधन हो गया था। अब इस परिवार में दो दिव्यांग विधवा महिलाएं और चार छोटे-छोटे मासूम अनाथ बच्चे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इनके पास सिर छिपाने के लिए एक सुरक्षित छत तक नहीं है, लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर जिला प्रशासन और बाल संरक्षण विभाग तक, हर कोई गहरी नींद में सोया है।
इस परिवार की स्थिति इतनी अमानवीय है कि भीषण गर्मी में जहां ये बेबस महिलाएं बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे झुलसने को मजबूर हैं, वहीं बरसात में भीगते हुए और कड़ाके की सर्दी में ठिठुरते हुए रातें बिताती हैं। हर बदलता मौसम इनके लिए एक नई चुनौती लेकर आता है। सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ या ‘अबुआ आवास’ का लाभ आज तक इन्हें नहीं मिला, जबकि ग्रामीणों के अनुसार गांव के कई सक्षम और संपन्न लोग इन योजनाओं का लाभ आसानी से उठा चुके हैं। यह सीधा सवाल खड़ा करता है कि असली हकदारों तक योजनाओं का लाभ क्यों नहीं पहुंच रहा है। फिलहाल, परिवार महज सरकारी राशन के अनाज से ‘नमक-भात’ खाकर किसी तरह अपना पेट पाल रहा है। इस पूरे प्रकरण में सबसे शर्मनाक पहलू जिला बाल संरक्षण इकाई की घोर विफलता और उदासीनता है। नियमतः ऐसे बच्चों के आंकड़े जुटाना और उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ना बाल संरक्षण इकाई की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
कानून और ‘मिशन वात्सल्य’ का बन रहा मज़ाक:
किशोर न्याय अधिनियम के तहत आते हैं बच्चे: किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 2 (14) के तहत ये चारों मासूम स्पष्ट रूप से ‘देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे’ की श्रेणी में आते हैं।
आंकड़े जुटाने में नाकामी: ‘मिशन वात्सल्य’ के दिशा-निर्देशों और किशोर न्याय नियमावली के तहत जिला बाल संरक्षण इकाई का यह दायित्व है कि वह ऐसे पिता विहीन और कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजार रहे बच्चों को चिन्हित कर उनका विस्तृत डेटाबेस (आंकड़े) तैयार करे, लेकिन विभाग इस काम में पूरी तरह विफल साबित हुआ है।
‘प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) योजना’ का नहीं मिला लाभ: मिशन वात्सल्य के तहत ऐसे कमजोर और अनाथ बच्चों को परिवार में ही रखकर उनके भरण-पोषण और शिक्षा के लिए ‘प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) योजना’ (जिसके तहत प्रतिमाह आर्थिक सहायता दी जाती है) से जोड़ा जाना अनिवार्य है। लेकिन विभाग की लापरवाही के कारण इन बच्चों को आज तक इसका कोई लाभ नहीं मिल सका है।
चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि और समाजसेवी भी इस परिवार की मदद के लिए आगे नहीं आए हैं। उनकी यह संवेदनहीनता चिंता का विषय है। अब जागरूक नागरिकों द्वारा जिला उपायुक्त और बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) से यह पुरजोर मांग की जा रही है कि वे इस मामले का ‘स्वतः संज्ञान’ लें। लापरवाह विभागीय अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए पीड़ित परिवार को तत्काल आवास और अनाथ बच्चों को ‘स्पॉन्सरशिप योजना’ का लाभ दिलाया जाए, ताकि वे भी समाज में सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकें।
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