उपायुक्त को सौंपा गया गंभीर ज्ञापन; धर्मांतरित व्यक्तियों को पारंपरिक पदों से हटाने और गांवों में ‘अवैध चंगाई सभाओं’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की उठी पुरजोर मांग; पाहन, महतो और मुंडा विहीन व्यवस्था को मानने से साफ इनकार
न्यूज स्केल लाइव ब्यूरो
लोहरदगा: भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले लोहरदगा जिले में पेसा (PESA) कानून और आदिवासी समाज की हजारों साल पुरानी पारंपरिक, रूढ़िवादी व्यवस्थाओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए आदिवासी समाज ने सीधे तौर पर प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
क्षेत्र के विभिन्न कड़े पारंपरिक आदिवासी संगठनों ने एकजुट होकर जिला उपायुक्त (DC) कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया और अपनी अस्तित्व रक्षा को लेकर एक बेहद गंभीर व महत्वपूर्ण मांग-पत्र (ज्ञापन) सौंपा है। समाज का सीधा आरोप है कि सरकार और जिला प्रशासन द्वारा ‘मॉडल ग्राम सभा’ के लोक-लुभावन नाम पर आदिवासियों की मूल सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक ढांचे के साथ सोची-समझी साजिश के तहत खिलवाड़ किया जा रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने किया नेतृत्व, कहा— ‘परंपराओं से समझौता नहीं’
इस बड़े और निर्णायक आंदोलन का नेतृत्व प्रखर आदिवासी चेतना की संवाहक और वरिष्ठ आईआरएस (IRS) अधिकारी निशा उरांव कर रही थीं। उन्होंने जिला प्रशासन को दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आदिवासियों के अपने विधिक और रूढ़िवादी अधिकार हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘पेसा कानून, 1996’ के तहत ग्राम सभाओं की जो मूल और ऐतिहासिक संरचना बनी हुई है, उसमें किसी भी प्रकार का बाहरी, गैर-पारंपरिक या प्रशासनिक बदलाव समाज को कतई स्वीकार्य नहीं होगा। प्रशासन विकास के नाम पर आदिवासियों की सांस्कृतिक संप्रभुता को नष्ट करने का प्रयास बंद करे।
चंगाई सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध और धर्मांतरित लोगों को पदों से बेदखल करने की गूंज
ज्ञापन के माध्यम से आदिवासी समाज ने इस बार कुछ बेहद संवेदनशील और बड़े मुद्दों को प्रखरता से उठाया है, जिससे पूरे जिले में इस मामले ने भारी तूल पकड़ लिया है:
अवैध चंगाई सभाओं पर रोक: समाज ने आरोप लगाया कि सुदूर ग्रामीण और वन क्षेत्रों के भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाने और उनका जबरन मत परिवर्तन कराने के उद्देश्य से गांवों में ‘अवैध चंगाई सभाएं’ धड़ल्ले से संचालित की जा रही हैं। समाज ने इन अंधविश्वास और धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली सभाओं पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
पारंपरिक पदों से हटाने की मांग: ज्ञापन में कड़ा रुख अपनाते हुए मांग की गई है कि जो लोग मूल आदिवासी संस्कृति और धर्म को छोड़कर धर्मांतरित हो चुके हैं, उन्हें आदिवासियों के पारंपरिक और रूढ़िवादी गरिमा के पदों से तत्काल प्रभाव से बेदखल किया जाए।
केवल पाहन, महतो और मुंडा वाली मूल ग्राम सभाओं को ही मिले सरकारी मान्यता
जिले की पारंपरिक बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के प्रमुखों ने जिला प्रशासन को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट किया है कि कागजों पर बनाई जा रही तथाकथित आधुनिक ग्राम सभाएं आदिवासियों का भला नहीं कर सकतीं।
आदिवासी संगठनों ने पुरजोर मांग की है कि जिला प्रशासन केवल और केवल उन्हीं ग्राम सभाओं को आधिकारिक व कानूनी मान्यता प्रदान करे, जहां सदियों से स्थापित ग्राम प्रधान, हातु मुंडा, महतो, पाहन और पाइनभरा जैसे पारंपरिक और रूढ़िवादी पदाधिकारी पूरी तरह से स्थापित और कार्यरत हैं। इन पदों के बिना गठित की जाने वाली किसी भी प्रशासनिक समिति या मॉडल ग्राम सभा का समाज पूर्ण रूप से बहिष्कार करेगा।
प्रशासनिक विफलता पर आक्रोश, मांगें पूरी न होने पर उग्र आंदोलन का अल्टीमेटम
आदिवासी नेताओं ने कहा कि यदि समय रहते प्रशासन ने उनकी इन गंभीर और अस्तित्व से जुड़ी जायज मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो पूरे लोहरदगा और पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में एक बड़ा और व्यापक जन-आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसकी पूरी जवाबदेही जिला प्रशासन की होगी।
इस महत्वपूर्ण ज्ञापन सौंपने के ऐतिहासिक मौके पर जिले के कोने-कोने से आए विभिन्न पड़हा राजा, दीवान, कोटवार, पाहन, बड़ी संख्या में आदिवासी बुद्धिजीवी, युवा और महिला आंदोलनकारी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ उपस्थित रहे।






















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