रांची, चतरा, लोहरदगा और देवघर समेत पूरे राज्य में दिखी आस्था की अद्भुत छटा; कच्चे सूत के फेरों के साथ मांगी पति की लंबी उम्र और अच्छी सेहत
झारखंड के कण-कण में आज आस्था, अगाध प्रेम और समर्पण का अनुपम संगम देखने को मिला। पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना का महापर्व ‘वट सावित्री व्रत’ शनिवार को पूरे राज्य में पारंपरिक श्रद्धा और असीम हर्षाेल्लास के साथ मनाया गया। राजधानी रांची के अलावा चतरा, लोहरदगा, गुमला, हजारीबाग, देवघर और दुमका सहित तमाम जिलों में सुबह से ही सुहागिन महिलाओं का हुजूम ‘देव वृक्ष’ वट (बरगद) के नीचे उमड़ पड़ा।
सोलह श्रृंगार और पावन परिक्रमा: जीवंत हो उठी संस्कृति
सुबह की पहली किरण के साथ ही पूजा पंडालों और वट वृक्षों के समीप चटक लाल, पीले और हरे रंग के पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं का आगमन शुरू हो गया। माथे पर रचता लंबा सौभाग्य सिंदूर, हाथों में खनकती चूड़ियां और सजी मेहंदी के साथ पूरे सोलह श्रृंगार में सुहागिनें हाथ में पूजा की थाली लिए नजर आईं।
धार्मिक अनुष्ठान के तहत महिलाओं ने वट वृक्ष को जल, पुष्प, फल और भीगे हुए चने अर्पित किए। इसके बाद पति-पत्नी के अटूट रिश्ते के प्रतीक ‘कच्चे सूत के धागे’ को पेड़ के चारों ओर 7 या 108 बार लपेटकर परिक्रमा की। यह धागा मात्र एक सूत्र नहीं, बल्कि दांपत्य जीवन को हर संकट से बचाने वाला अभेद्य रक्षासूत्र माना जाता है। परिक्रमा के बाद महिलाओं ने यमराज से अपने पति के प्राण वापस लाने वाली पतिव्रता सती सावित्री की पावन कथा श्रवण की।
“प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत मेल है यह व्रत” — पुरोहित अभिषेक मिश्रा
महापर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए लोहरदगा के विख्यात पुरोहित अभिषेक मिश्रा ने ‘न्यूज़ स्केल लाइव’ को बताया: “वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्म के जुड़ाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। वट वृक्ष (बरगद) को साक्षात ‘त्रिदेव’ (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का रूप माना जाता है। इसकी आयु दीर्घ होती है, इसलिए इसके नीचे बैठकर पूजा करने से पति को भी दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य का वरदान प्राप्त होता है। सती सावित्री ने जिस प्रकार दृढ़ संकल्प से यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था, यह व्रत हर महिला को अपने परिवार और साथी के प्रति उसी समर्पण और शक्ति की याद दिलाता है।”
चारों ओर छाया रहा उत्सव का माहौल
धूप और गर्मी के बावजूद सुहागिनों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। पूजा संपन्न होने के बाद महिलाओं ने अपने पति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और बुजुर्गों से अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान पाया। रंग-बिरंगे परिधानों और मंगल गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक रस से सराबोर रहा।





















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