झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के संस्थापक शिबू सोरेन के सोमवार को दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल में निधन के साथ झारखंड के एक राजनीतिक युग का अंत हो गया है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन से राजनीतिक जगत में शोक की लहर है। उनके निधन को झारखंड की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है।
झारखंड में शोक की लहर
शिबू सोरेन के निधन की खबर मिलते ही झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेतओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। शिबू सोरेन का संपूर्ण राजनीतिक जीवन आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय पहचान की लड़ाई को समर्पित रहा। उन्होंने झारखंड राज्य के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई और आदिवासी समाज की आवाज को संसद तक पहुंचाया।
ततकालीन बिहार के हजारीबाग में जन्मे थे शिबू सोरेन

शिबू सोरेन का जन्म उस समय बिहार के हजारीबाग अब झारखंड के रामगढ़ में 11 जनवरी 1944 को हुआ था। उन्हें दिशोम गुरु और गुरुजी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने आदिवासियों के शोषण के खिलाफ लंबी संघर्ष की थी। 1977 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा था, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, 1980 से वह लगातार कई बार सांसद चुने गए।
बिहार से अलग राज्य ‘झारखंड’ बनाने के आंदोलन में भी उनकी निर्णायक भूमिका रही है। वे तीन बार (2005, 2008, 2009) झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन
हजारीबाग के नेमरा में जन्म। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई। बेटे हेमंत सोरेन झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री।
आठ बार बने लोकसभा सांसद
1980 पहली बार, 1989 दूसरी बार, 1991 तीसरी बार, 1996 चौथी बार, 2002 पांचवीं बार, 2004 छठवीं बार, 2009 सातवीं बार, 2014 आठवीं बार सांसद बने। दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे 8 जुलाई 1998 से 18 जुलाई 2001 तक। 10 अप्रैल 2002 से 2 जुलाई 2002 तक।
2004 मई से 10 मार्च 2005 के बीच यूपीए सरकार के कार्यकाल में कोयला और खान मंत्रालय के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री भी रहे। इस बीच तीस साल पुराने जामताड़ा के एक मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने की वजह से 24 जुलाई 2004 को उन्हें पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था। इस मामले में करीब एक महीने तक जेल में बंद रहने के बाद वे जमानत पर रिहा हुए और नवंबर 2004 को उन्हें फिर से केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई, लेकिन मार्च 2005 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
झारखंड विधानसभा चुनाव 2005 के बाद 2 मार्च 2005 को शिबू सोरेन पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण महज 10 दिन के अंदर ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।
उसके बाद 29 जनवरी 2006 से 28 नवंबर बीच केंद्रीय कोयला मंत्री रहे। 29 नवंबर 2006 को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा।