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इलाज के दौरान ट्रक चालक की मौत, शव के लिए ₹2.05 लाख का बिल बना गरीब परिवार की मजबूरी

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चार बच्चों के साथ अस्पताल के बाहर बैठी पत्नी, परिजनों ने लगाया शव रोकने का आरोप; कानूनी अधिकारों के तहत प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग

सिमरिया (चतरा)। चतरा जिले के सिमरिया प्रखंड अंतर्गत चोपे पंचायत के बड़गांव निवासी 38 वर्षीय ट्रक चालक शिवसागर उपाध्याय की इलाज के दौरान मौत के बाद उनका परिवार आर्थिक संकट में फंस गया है। पति की मौत के बाद पत्नी निक्की देवी अपने चार छोटे-छोटे बच्चों के साथ पिछले दो दिनों से रांची के बूटी मोड़, बरियातू स्थित आलम हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के बाहर बैठी हैं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल की ओर से करीब 2.05 लाख रुपये का अतिरिक्त बिल बताए जाने के बाद शव सौंपने में परेशानी हो रही है।

सड़क दुर्घटना में हुए थे गंभीर रूप से घायल

जानकारी के अनुसार, 12 अगस्त को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में शिवसागर उपाध्याय सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बताया गया कि वह ट्रक से नीचे उतरे थे, तभी एक तेज रफ्तार कार ने उन्हें टक्कर मार दी। स्थानीय स्तर पर उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए रांची स्थित आलम हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

इलाज के लिए बेच दी गाय-बकरी

मृतक की पत्नी निक्की देवी का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। पति के इलाज के लिए उन्होंने गाय-बकरी बेचकर और ग्रामीणों से सहयोग लेकर करीब ढाई लाख रुपये अस्पताल में जमा किए। इसके बावजूद इलाज के दौरान पति की मौत हो गई।

निक्की देवी के अनुसार, पति की मौत के बाद जब वह शव लेने पहुंचीं तो अस्पताल की ओर से 2 लाख 5 हजार रुपये की अतिरिक्त राशि का बिल बताया गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह तत्काल इतनी बड़ी रकम जमा कर सके।

चार बच्चों के साथ अस्पताल के बाहर बैठी महिला

निक्की देवी अपने चार छोटे बच्चों के साथ अस्पताल के बाहर बैठकर प्रशासन और समाजसेवियों से मदद की गुहार लगा रही हैं। उनका कहना है कि पति की मौत के बाद परिवार के पास अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं।

परिजनों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप कर शव उन्हें सौंपने की व्यवस्था कराने और अस्पताल के बिल की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

शव रोकने के मामले में क्या है कानूनी पहलू?

केंद्र सरकार के मरीज अधिकार संबंधी दस्तावेज में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मृत मरीज के परिजनों को शव प्राप्त करने का अधिकार है और अस्पताल शुल्क के भुगतान या शुल्क को लेकर विवाद के आधार पर शव को रोका नहीं जाना चाहिए। ऐसे बकाये की वसूली के लिए अस्पताल को कानूनन उपलब्ध अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए।

अदालतों के समक्ष भी ऐसे मामलों में यह सिद्धांत सामने आया है कि अस्पताल बकाया राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है, लेकिन मृतक के शव को भुगतान की शर्त के रूप में रोकना उचित नहीं है।

हालांकि, इस मामले में अस्पताल प्रबंधन की ओर से कथित अतिरिक्त बिल और शव सौंपने को लेकर लगाए गए आरोपों पर उसका पक्ष सामने आना बाकी है। इसलिए यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि अस्पताल ने कानून का उल्लंघन किया है। मामले में प्रशासनिक जांच के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

परिवार को अब प्रशासन से उम्मीद

पीड़ित परिवार ने सरकार, जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है। परिवार का कहना है कि आर्थिक रूप से असमर्थ होने के कारण वे अपने परिजन का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पा रहे हैं। अब सवाल यह है कि प्रशासन इस मामले में कब हस्तक्षेप करता है और मृतक के परिवार को शव तथा बकाये बिल से जुड़े विवाद का कानूनी समाधान किस तरह उपलब्ध कराया जाता है।

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