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21वीं सदी में भी अंधेरे में जी रहा घामा पहाड़ गांव

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न बिजली, न सड़क, न शुद्ध पेयजल और न मोबाइल नेटवर्क; ग्रामीण बोले– चुनाव में सिर्फ वादे, अब चाहिए विकास

पत्थलगड़ा (चतरा) श्रीकांत राणा। चतरा जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर स्थित मेराल पंचायत के सुदूरवर्ती घामा पहाड़ गांव की तस्वीर आज भी विकास से कोसों दूर है। लगभग एक हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव में आज तक न बिजली पहुंची है, न पक्की सड़क बनी है और न ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हो सकी है। मोबाइल नेटवर्क की सुविधा भी नहीं होने से ग्रामीणों को रोजमर्रा के जीवन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार, गांव में अब तक बिजली के खंभे तक नहीं लगाए गए हैं। सूरज ढलते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है और लोग लालटेन एवं ढिबरी के सहारे जीवन गुजारने को मजबूर हैं। बिजली नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।

पेयजल की समस्या भी गांव की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। बरसात के दिनों में लोग पहाड़ के झरनों का पानी पीते हैं, जबकि गर्मी के मौसम में नदी और चुआ से दूर-दूर तक पानी लाना पड़ता है। शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होने से ग्रामीणों में बीमारियों का खतरा भी बना रहता है।

आवागमन की स्थिति भी बेहद खराब है। मेराल पंचायत से घामा पहाड़ गांव तक आज तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है। बारिश के दिनों में रास्ता और भी दुर्गम हो जाता है। किसी के बीमार पड़ने पर मरीज को चारपाई पर लादकर कई किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह रास्ता किसी चुनौती से कम नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सड़क, बिजली, पानी और मोबाइल टावर की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन आज तक केवल आश्वासन ही मिला है। उनका आरोप है कि चुनाव के समय नेता गांव आते हैं, वादे करते हैं और फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद कोई हालचाल लेने नहीं आता।

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि घामा पहाड़ गांव में अविलंब बिजली, शुद्ध पेयजल, पक्की सड़क और मोबाइल नेटवर्क (टावर) की व्यवस्था कराई जाए, ताकि ग्रामीण भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।

ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हम लोग अंधेरे में पैदा हुए, अंधेरे में ही बूढ़े हो गए। बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती। बीमार पड़ जाएं तो अस्पताल पहुंचते-पहुंचते जान पर बन आती है। अब और इंतजार नहीं

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