जंगलों में कटते पेड़ों के कारण इंसानों पर बढ़े हमले; कुश्ती महासंघ से वनकर्मियों को ट्रेनिंग दिलाने की मांग, सीएस बोले— ‘अस्पतालों में एंटी स्नेक वेनम पर्याप्त’
न्यूज स्केल लाइव ब्यूरो
लोहरदगा: झारखंड के लोहरदगा जिले में जंगलों की अंधाधुंध कटाई और बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन के कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच का संघर्ष (Man-Animal Conflict) बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। जिले में लगातार बढ़ते भालुओं के हिंसक हमलों और मानसून से ठीक पहले सांपों के बढ़ते खौफ ने वन, पर्यावरण और वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ी प्रशासनिक चिंता पैदा कर दी है। स्थानीय ग्रामीणों में वन विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली को लेकर गहरा असंतोष है।
मडुआपाट और पेशरार में भालुओं की भारी पैठ, एक महीने में दो शिकार
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पिछले महज एक महीने के भीतर लोहरदगा के विभिन्न जंगली इलाकों में इंसानों पर भालू के प्राणघातक हमले की दो बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
इन जंगलों में है मूवमेंट: वर्तमान में पाखर, पेशरार और मडुआपाट के घने जंगलों में भालुओं की लगातार गतिविधियां और मूवमेंट पाई गई है।
कटते जंगल बने वजह: वन विभाग के इनपुट के अनुसार, सबसे ज्यादा तादाद में भालू मडुआपाट के जंगल में मौजूद हैं। लगातार हो रही वनों की अवैध कटाई के कारण इन वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास उजड़ रहे हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है और वे भोजन व पानी की तलाश में गांवों का रुख कर इंसानों को निशाना बना रहे हैं।
वनकर्मियों को मिले कुश्ती की ट्रेनिंग, करोड़ों के बजट का कहाँ हो रहा इस्तेमाल?
भालुओं के बढ़ते आतंक को देखते हुए प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और वन विभाग से एक बेहद अनूठी व ठोस मांग की है:
शारीरिक व मानसिक अभ्यास: ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग का सालाना बजट करोड़ों रुपये का है। इस भारी-भरकम बजट में वन कर्मियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ करने के लिए विशेष ट्रेनिंग का प्रावधान होना चाहिए। नियमित शारीरिक अभ्यास से ही वनकर्मी भालुओं की हरकतों पर अंकुश लगा सकते हैं।
कुश्ती महासंघ से लें मदद: ग्रामीणों ने सुझाव दिया है कि वन कर्मियों को विपरीत परिस्थितियों में जंगली जानवरों का मुकाबला करने के लिए लोहरदगा जिला कुश्ती महासंघ से तकनीकी मदद और विशेष रेस्क्यू ट्रेनिंग दिलाई जानी चाहिए। इसके बाद इन कमांडो नुमा प्रशिक्षित वन कर्मियों की तैनाती सीधे उन ‘हॉटस्पॉट’ इलाकों में की जाए, जहां भालुओं का आतंक सबसे ज्यादा है।
गर्मी और उमस के बीच बढ़ा सर्पदंश का खतरा, अस्पतालों में दवा मुस्तैद
एक तरफ जहां ग्रामीण भालुओं से खौफजदा हैं, वहीं दूसरी ओर मानसून की दस्तक से ठीक पहले भीषण गर्मी और उमस के इस मौसम में जिले के ग्रामीण इलाकों में सर्पदंश (Snake Bite) की घटनाएं भी तेजी से पैर पसार रही हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए लोहरदगा सिविल सर्जन ने स्थिति साफ की है:
अस्पतालों में स्टॉक फुल: सिविल सर्जन के अनुसार, लोहरदगा सदर अस्पताल सहित जिले के सभी प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी स्नेक वेनम (Anti-Snake Venom) पर्याप्त और भारी मात्रा में उपलब्ध है। अंधविश्वास से जा रही जान: सीएस ने चिंता जताते हुए कहा कि अक्सर सर्पदंश के शिकार लोगों को परिजन झाड़-फूंक के चक्कर में समय पर अस्पताल नहीं लाते हैं, जिससे मरीजों की असमय मौत हो जाती है। सांप काटने पर तुरंत मरीज को नजदीकी सरकारी अस्पताल लाएं।
सांपों को वश में करने के लिए वनकर्मियों को दी जाए ‘बीन’ बजाने की ट्रेनिंग
सर्पदंश के मामलों में स्थायी कमी लाने और बहुमूल्य मानव जीवन व वन्यजीवों की रक्षा के लिए पर्यावरणविदों और ग्रामीणों द्वारा वन विभाग से एक और विशेष मांग की जा रही है:
रेस्क्यू में बनाएं कुशल: वन कर्मियों को आधुनिक रेस्क्यू टूल्स के साथ-साथ जहरीले सांपों की सटीक पहचान करने में कुशल बनाया जाए।
बीन बजाने का प्रशिक्षण: मांग की जा रही है कि वनकर्मियों को पारंपरिक रूप से बीन बजाकर सांपों को वश में करने और उन्हें बिना चोट पहुंचाए सुरक्षित तरीके से रिहायशी इलाकों से रेस्क्यू कर गहरे जंगलों में छोड़ने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इससे जिले में सांपों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी और असमय होने वाली मौतों का आंकड़ा भी शून्य पर आ सकेगा।























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