यहां मां दुर्गा को ताज पहनाने का है अनोखा रिवाज, पिता लगाते हैं नंबर और बेटा को मिलता है मौका, यह परंपरा 1941 से चली आ रही है, 2064 तक के लिए नाम तय हो गया है, ढाई दशक की प्रतीक्षा के बाद इस बार अनंत कुमार सिन्हा के परिवार को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है

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यहां मां दुर्गा को ताज पहनाने का है अनोखा रिवाज, पिता लगाते हैं नंबर और बेटा को मिलता है मौका, यह परंपरा 1941 से चली आ रही है, 2064 तक के लिए नाम तय हो गया है, ढाई दशक की प्रतीक्षा के बाद इस बार अनंत कुमार सिन्हा के परिवार को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है

मयूरहंड(चतरा) जिले के मयूरहंड प्रखंड मुख्यालय में मां दुर्गा को ताज पहनाने की अनोखी परंपरा है। जहां पिता नंबर लगाते हैं और बेटे को  सौभाग्य प्राप्त होता है। अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि माता रानी को मुकुट चढ़ाने वालों का नाम 2064 तक के लिए तय हो चुका है। यदि अब कोई मुकुट चढ़ाने के लिए इच्छा व्यक्त करेंगे, तो उन्हें चार दशक अर्थात 2064 तक इंतजार करना होगा। यह परंपरा वर्ष 1941 से चली आ रही है, ढाई दशक की प्रतीक्षा के बाद इस बार ललित किशोर प्रसाद के परिवार को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनके पिता ने 1984 में नंबर लगाया था। दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अश्विनी सिंह ने बताया कि मां दुर्गे के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता के रूप में मुकुट चढ़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा सात दशक से चली आ रही है। पूजा सेे एक महीना पहले पूजा कमेटी की बैठक होती है। जिसमें आसपास के विभिन्न गांवों के लोग शामिल होते हैं और मुकुट चढ़ाने के लिए अपनी इच्छा जताते हैं। जो पहले इच्छा व्यक्त करते हैं, उन्हें बुकिंग के बाद का पहला नंबर दिया जाता है। श्रद्धालु संबंधित भक्त के घर से मुकुट के साथ जुलूस की शक्ल में दुर्गा मंडप तक पहुंचते हैं। उसके बाद पूजा के पश्चात माता रानी को मुकुट पहनाया जाता है। मुकुट का निर्माण बंगाल के कारीगर करते हैं। जिस पर करीब अठारह से बीस हजार रुपये का खर्च आता है। दुर्गा मंदिर में मुकुट चढ़ाने व विसर्जन के दिन मां की प्रतिमा को कंधे पर विसर्जन करने की परंपरा पिछले 84 वर्षों से निरंतर कायम है। इस वर्ष द्वारिका राणा ने मुकुट का चढ़ावा चढ़ाने के लिये नंबर लगाया है, उन्हें 41 वर्ष बाद 2064 में का नंबर मिला है। मयूरहंड़ दुर्गा पूजा का इतिहास 82 वर्ष पुराना है। यहां पूजा की शुरुआत वर्ष 1941 में हुई थी। शुरुआती दौर में खुटे-डंडे पर तिरपाल लगाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाति थी। गांव में दुर्गा पूजा की शुरुआत करने का मुख्य उद्देश्य गांव में फैली हैजा महामारी को दूर भागना था। मौके पर रामभरोस सिंह,अलखदेव सिंह, शशि प्रमोद लाल, संतोष सिन्हा,आदित्य सिंह, रणधीर सिंह, रामजतन सिन्हा के अलावा ग्रामीण व श्रद्धालु उपस्थित थे।

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