मां भद्रकाली मंदिर की अखंड ज्योत से दीप लाकर ठाकुरबाड़ी में होता है शुभारंभ; बच्चे से बुजुर्ग तक समय-सारणी के अनुसार करते हैं पाठ
मयूरहंड (चतरा)। मयूरहंड प्रखंड के पंदनी पंचायत अंतर्गत पचघारा गांव अपनी विशिष्ट परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां ठाकुरबाड़ी प्रांगण में वर्ष 1981 से लगातार शारदीय नवरात्र में रामायण पाठ का आयोजन किया जा रहा है।
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत गांव के ही शकुंतला देवी (पति अमीर सिंह), यशवंत नारायण सिंह, सुरेंद्र सिंह, नित्यानंद सिंह आदि ने की थी, जिसका अनुसरण आज की युवा पीढ़ी भी कर रही है। वर्ष 2016 से रामायण पाठ का शुभारंभ मां भद्रकाली मंदिर में अखंड हरिकीर्तन स्थल पर प्रज्वलित अखंड ज्योत से दीप जलाकर किया जा रहा है। नवरात्र के पहले दिन ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ मां भद्रकाली मंदिर पहुंचकर अखंड ज्योत से दीप प्रज्वलित कर लाते हैं और उसे ठाकुरबाड़ी में स्थापित कर अखंड रामायण पाठ शुरू करते हैं, जो पूरे नवरात्र चलता है। इस दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है। सारा अनुष्ठान आचार्य विकास पंडित विधि-विधान से संपन्न कराते हैं।

आयोजन में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले ग्रामीण भी घर लौटकर पाठ में शामिल होते हैं। गांव की लगभग बारह जोड़ियां वर्षों से नियमित रूप से रामायण पाठ करती आ रही हैं। यहां की खासियत है कि बच्चे, किशोर, युवक, युवती और वृद्ध, सभी समय-सारणी के अनुसार पाठ में हिस्सा लेते हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पूरा गांव सात्विक वातावरण में डूबा रहता है।
सबसे अनोखी परंपरा यह है कि नौ दिनों तक पूरे गांव का भोजन एक ही स्थान पर बनता है और सभी साथ बैठकर खाते हैं। बाहर से आने वाले मेहमान भी वहीं प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करते हैं। यह परंपरा आपसी एकजुटता और सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण है।
ग्रामीण गरजु सिंह ने कहा कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और सबसे सुखद पहलू यह है कि नई पीढ़ी भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। उन्होंने कहा कि पुरानी पीढ़ी भले धीरे-धीरे कम हो रही है, लेकिन युवा उसी राह पर चलकर संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं।
ग्रामीण अनंत कुमार सिंह ने बताया कि सबका उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जोड़े रखना है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की तेज रफ्तार में कहीं हमारी परंपरा कमजोर न पड़ जाए, इसी सोच के साथ हर साल नवरात्र को अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। बच्चे भी पूरे उत्साह से भाग लेकर संस्कृति की इस धारा को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराते हैं। इस तरह पचघारा का यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।



















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