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लाल आतंक तो मिटा, पर हारूल गांव की बदहाली नहीं: दो दशक बाद भी पक्की सड़क को तरस रहे ग्रामीण, प्रसव के वक्त डोली-खटोली ही सहारा

On: June 3, 2026 9:09 PM
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बारिश आते ही टापू बन जाता है गांव; चितवातरी टोला में 1 किमी दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं महिलाएं, प्रमुख प्रतिनिधि बोले— उपायुक्त को कराएंगे अवगत

न्यूज स्केल लाइव

कुंदा (चतरा): चतरा जिले का सुदूरवर्ती कुंदा प्रखंड आज भी विकास की दौड़ में मीलों पीछे छूटा हुआ नजर आ रहा है। दो दशक पूर्व तक भाकपा माओवादी और टीएसपीसी जैसे उग्रवादी संगठनों का ‘सेफ जोन’ (सुरक्षित ठिकाना) माने जाने वाला कुंदा प्रखंड का हारूल गांव आज लाल आतंक के खात्मे के बावजूद मूलभूत सुविधाओं के घोर अभाव में बदहाली के आंसू बहा रहा है। चारों ओर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों से घिरे इस गांव की भौगोलिक और सामाजिक तस्वीर वर्षों बाद भी जस की तस बनी हुई है।

बरसात आते ही टापू में तब्दील हो जाता है गांव, थामनी पड़ती हैं सांसें

ग्रामीणों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि मानसून दस्तक देते ही हारूल गांव पूरी तरह से एक टापू का रूप ले लेता है। उफनती नदी और नालों के कारण ग्रामीणों का संपर्क बाहरी दुनिया और प्रखंड मुख्यालय से लगभग पूरी तरह कट जाता है।

  • पक्की सड़क का घोर अभाव: आजादी के इतने दशकों बाद भी गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए एक अदद पक्की सड़क तक नसीब नहीं हुई है।

  • जान पर खेलती हैं प्रसव पीड़ित महिलाएं: गांव में सड़क और पुल न होने का सबसे खौफनाक खामियाजा बीमार बुजुर्गों और प्रसव पीड़ित महिलाओं को भुगतना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती, जिसके कारण मरीजों को ‘डोली-खटोली’ (खाट) पर लादकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए 1 किलोमीटर दूर पक्की सड़क तक पैदल लाना पड़ता है।

  • घंटों नदी किनारे मौत का इंतजार: यदि नदी में पानी का तेज बहाव हो, तो मरीजों को लेकर ग्रामीण घंटों नदी किनारे जलस्तर घटने का इंतजार करते हैं। कई बार इस प्रशासनिक देरी के कारण मरीजों की जान पर बन आती है।

चितवातरी टोला में बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, रोजगार न मिलने से पलायन

सड़क के अलावा हारूल गांव के चितवातरी टोला में पेयजल संकट ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है।

पानी के लिए जंग: भीषण गर्मी के इस मौसम में गांव का जलस्तर नीचे चले जाने से कुएं-चापाकल सूख चुके हैं। विशेषकर महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालकर लगभग 1 किलोमीटर दूर से सिर पर पानी ढोकर लाना पड़ता है। एक घड़ा पीने के पानी के लिए महिलाओं को चिलचिलाती धूप में घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।

इसके साथ ही, गांव में कृषि के अलावा रोजगार का कोई दूसरा साधन उपलब्ध नहीं है। विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह कटे होने के कारण इस गांव की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को विवश हो चुका है।

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एक स्वर में गूंजी मांग: पहले सड़क और पुल दो, तभी मिलेगा चैन

हारूल गांव और चितवातरी टोला के ग्रामीणों ने एकजुट होकर जिला प्रशासन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। ग्रामीणों ने एक स्वर में मांग करते हुए कहा कि सरकार और स्थानीय विधायक-सांसद सबसे पहले उनके गांव को पक्की सड़क से जोड़ें और राह में रोड़ा बनी नदी पर अविलंब पुल का निर्माण कराएं, ताकि इस बारहमासी नरकीय आवागमन की समस्या का स्थायी और तकनीकी समाधान हो सके।

उपायुक्त और बीडीओ से वार्ता कर दिलाएंगे राहत: जयराम भारती

इस गंभीर जनसमस्या को लेकर जब ‘न्यूज स्केल लाइव’ ने स्थानीय प्रमुख प्रतिनिधि जयराम भारती से बात की, तो उन्होंने ग्रामीणों की मांगों को जायज ठहराते हुए कहा:

“हारूल गांव की भौगोलिक स्थिति वाकई विकट है। सड़क एवं पुल निर्माण की इस अति आवश्यक मांग को लेकर मैं स्वयं चतरा उपायुक्त (DC) रवि आनंद को एक मांग पत्र सौंपकर वस्तुस्थिति से अवगत कराऊंगा। इसके अतिरिक्त, चितवातरी टोला में व्याप्त गंभीर पेयजल संकट के त्वरित निवारण के लिए कुंदा बीडीओ (प्रखंड विकास पदाधिकारी) से वार्ता की जाएगी, ताकि वहां जल्द से जल्द एक बड़ी जलमीनार (सोलर आधारित) स्थापित कराई जा सके और ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित हो।”

‘न्यूज स्केल लाइव’ की टिप्पणी: अब देखना यह दिलचस्प होगा कि प्रमुख प्रतिनिधि के इस आश्वासन के बाद चतरा जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग इस संवेदनशील आदिवासी बहुल गांव की बदहाली को लेकर कितनी संजीदगी दिखाता है और वर्षों से मूलभूत सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हारूल के ग्रामीणों को कब तक इस नरक से मुक्ति मिलती है।

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