लोहरदगा। झारखंड राज्य में बढ़ते बाल विवाह चिंता का विषय बने हुए हैं। लोहरदगा जिले में भी हाल के वर्षों में बाल विवाह की घटनाएँ सामने आई हैं। हालांकि कुछ मामलों में सामाजिक पहल से विवाह रोके गए, लेकिन पहली बार बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का प्रभावी उपयोग करते हुए न्यायालय के आदेश से बाल विवाह को रोका गया है। इस पूरे प्रकरण में बच्चों के अधिकारों की रक्षा हेतु कार्यरत जिला समन्वयक अभिलाषा की भूमिका सराहनीय रही।
मामले की जानकारी बघा पंचायत के पंचायत सचिव महफूज़ अंसारी ने जिला प्रशासन को दी, जिसके बाद प्राधिकृत जिला समन्वयक ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डालसा) सचिव राजेश कुमार के संज्ञान में सभी तथ्य प्रस्तुत किए। डालसा सचिव द्वारा विवाह का कार्ड तथा विद्यालय से निर्गत जन्म प्रमाण पत्र का परीक्षण किया गया। इसके पश्चात पंचायत सचिव, जो बाल विवाह निषेध पदाधिकारी के रूप में भी कार्यरत हैं, से विधिवत आवेदन प्राप्त किया गया।
डालसा पैनल की अधिवक्ता इंद्राणी कुजूर के सहयोग से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में बाल विवाह रोकने हेतु अंतरिम निषेधाज्ञा के लिए आवेदन दायर किया गया। माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कृष्ण कांत मिश्रा ने मामले की सुनवाई के बाद कंचन कुमारी (परिवर्तित नाम), उम्र 16 वर्ष, जिसकी शादी 23 जनवरी 2026 को निर्धारित थी, के संबंध में अंतरिम निषेधाज्ञा आदेश पारित किया। आदेश में लड़की के माता-पिता को निर्देश दिया गया कि न्यायालय के अगले आदेश तक अथवा 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने से पहले विवाह नहीं किया जाएगा।
इस संबंध में डालसा सचिव ने बताया कि लोहरदगा जिले में यह पहला अवसर है जब बाल विवाह रोकने के लिए न्यायालय से आदेश प्राप्त हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि माता-पिता न्यायालय के आदेश की जानकारी के बावजूद उसकी अवहेलना करते हैं, तो उन्हें दो वर्ष तक की सजा, एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। हालांकि, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत किसी भी महिला को कारावास की सजा नहीं दी जा सकती। यह मामला न केवल कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का उदाहरण है, बल्कि बाल अधिकार संरक्षण की दिशा में जिले के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल भी माना जा रहा है।



















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