“मासूम मिल गए… राहत भी है, सवाल भी।”
12 दिनों तक चले इंतज़ार के बाद अंश और अंशिका की सुरक्षित बरामदगी ने जहां आम लोगों को सुकून दिया, वहीं अब इस पूरे मामले को लेकर सियासत तेज हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने बच्चों की बरामदगी के बाद झारखंड सरकार और पुलिस प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने बच्चों की बरामदगी के मामले में झारखंड सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि इसमें दो राय नहीं कि पुलिस ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन सच्चाई यह भी है कि यह मामला गांव-गांव तक फैल गया और आम लोग बच्चों की तलाश में जुट गए। मरांडी ने दावा किया कि रामगढ़ जिले के चितरपुर से बजरंग दल के कार्यकर्ताओं—सचिन प्रजापति, डबलु साहु, सन्नी और उनके साथियों—ने दिलेरी दिखाते हुए दोनों बच्चों को सकुशल ढूंढ निकाला, जो काबिल-ए-तारीफ है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में तस्वीरें भी सार्वजनिक हैं, जिनसे हकीकत और बयानों के बीच का अंतर साफ समझा जा सकता है।
उन्होंने पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस ने अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन जिन युवाओं ने जमीन पर जाकर बच्चों को बरामद किया, उनके लिए प्रोत्साहन के दो शब्द तक नहीं कहे गए। मरांडी ने आशंका जताई कि अब श्रेय लेने की होड़ मचेगी और चुनिंदा लोगों को ही पुरस्कार दिए जाएंगे। नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि पुलिस इन युवाओं को बुलाकर सम्मानित करे, ताकि आगे भी समाज के लोग मदद के लिए आगे आएं। उन्होंने कहा कि दूसरों की मेहनत और पहचान को दबा देना एक तरह की “दलाल संस्कृति” है, जिससे बचा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी निशाना साधते हुए मरांडी ने कहा कि प्रशासन की प्रशंसा में किए गए सोशल मीडिया पोस्ट से लगता है कि उन्हें जमीनी हकीकत की पूरी जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने आग्रह किया कि मुख्यमंत्री वास्तविक स्थिति जानकर अपने बयान में संशोधन करें और असली नायकों को सम्मान दें। अंत में मरांडी ने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह मान लिया जाएगा कि व्यवस्था संवेदनहीन थी, है और आगे भी रहेगी, जो बेहद निंदनीय और शर्मनाक है।
News Scale Live | भरोसे की पहचान





















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