रिपोर्ट: News Scale LIVE – ब्यूरो पारस कुमार इंद्र गुरु लोहरदगा : गायत्री शक्तिपीठ लोहरदगा में आयोजित पांच दिवसीय प्रज्ञा पुराण समापन नौ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ एवं विविध संस्कार से हुआ।नौ कुंडों में कई पालियो में सैकड़ो भाई बहनों ने देव पूजन किए एवं आज्ञाहुति समर्पित किए।
इस मौके पर टोली नायक नकुल देव शास्त्री ने यज्ञ के महत्व पर सारगर्भित चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में यज्ञ का बड़ा महत्व। भारतीय संस्कृति अर्थात देव संस्कृति के दो निर्माता कह गए हैं, यज्ञ एवं गायत्री। देव संस्कृति के दो निर्माता यज्ञ पिता गायत्री माता। नकुल देव ने कहा यज्ञ को सत्कर्म एवं गायत्री को सद्बुद्धि का प्रतीक माना गया है। जिसने गायत्री एवं यज्ञ अपनाया है उसका व्यक्तित्व परिष्कृत हुआ है।वह महानता के उच्चतम शिखर को प्राप्त किया है। उन्होंने कहा यज्ञ से वातावरण शुद्ध होता है, हानिकारक जीवाणु नष्ट होते हैं। सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, रोमांटिक शांति मिलती है। यज्ञ से आध्यात्मिक लाभ के साथ भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। यज्ञ एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा आंतरिक जगत एवं बाह्य जगत दोनों को ठीक किया जा सकता है।
इस कार्यक्रम में कई गुरु दीक्षा संस्कार एवं अन्य संस्कार में संपन्न हुए। भारतीय संस्कृति में गौ, गंगा, गीता, गुरु एवं गायत्री को भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ माना गया है। इन पांचो को संजीवनी विद्या कहा गया। इनमें गुरु का स्थान सर्वोच्च है। गुरु के बिना किसी का कल्याण संभव नहीं है। गुरु का अर्थ है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, कुमार्ग से श्रेष्ठ मार्ग का पथ प्रशस्त करे वो गुरु कहलाते हैं। जब किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण होता है, तो गुरु साधारण मानव को महामानव, बना देता है। नरेंद्र के जीवन में जब रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु की कृपा हुई तो साधारण नरेंद्र को संत विवेकानंद बना दिया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की धर्म ध्वजा को विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा दिया। मूल शंकर नामक बालक को जब वृजानंद जैसे गुरु मिले तो उन्हें स्वामी दयानंद सरस्वती बना दिया, जिन्होंने वेदों का प्रचार किया एवं भारत में फैले पाखंडों को समाप्त करने के लिए पाखंड खंडनी पताका फहराया। वशिष्ठ एवं विश्वामित्र जैसे गुरु की कृपा जब राम के ऊपर हुई तो उसे मर्यादा पुरुषोत्तम बना दिया। भगवान ऋषि संदीपन जैसे गुरु की कृपा से भगवान कृष्ण को योगेश्वर कृष्ण बना दिया। गुरु शिष्य की परंपरा भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। एक समय भारत जगतगुरु के नाम से जाना जाता था। समस्त विश्व को भारत का अजस्र अनुदान में श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने विस्तार से विवेचन किया है।
इस कार्यक्रम में 25 गुरु दीक्षा संस्कार एवं अन्य के संस्कार संपन्न हुए। कार्यक्रम बहुत शानदार और सफल रहा। यज्ञ के बाद यज्ञ की पूर्णाहुति एवं टोली की भाव भरी विदाई हुई। एवं भंडारा का कार्यक्रम हुआ।



















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