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मंत्री की पुत्री एवं तीन अन्य बच्चों की मृत्यु: क्यों उठने चाहिए ये चार कड़े सवाल?

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हाईवे पर लावारिस खड़े ट्रक, पेट्रोलिंग की लापरवाही और समाज की दोहरी सोच पर गंभीर सवाल

हजारीबाग | न्यूज स्केल लाइव

झारखंड की मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की पुत्री तृषा सिंह एवं उनके तीन युवा साथियों की दुर्घटना में असमय मृत्यु से कई महत्वपूर्ण सवाल फिर से उठ रहे हैं। यदि इन सवालों की ओर अब भी ध्यान नहीं दिया गया, तो पता नहीं और कितनी ऐसी दुर्घटनाओं में माता-पिता की गोद सूनी होगी।

❓ पहला सवाल — लावारिस खड़े ट्रक पर कार्रवाई कब?

इस तरह से ट्रक को खड़ा रखने वाले ट्रक ड्राइवर और मालिक पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं? इन पर तो चार मासूमों की हत्या का आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। रात के अंधेरे में लावारिस हालत में बीच सड़क पर खड़ा ट्रक न जाने कितनी दुर्घटनाओं का कारण बनता है। कुछ ट्रकों के पीछे परावर्तक टेप (रेडियम टेप) लगी होती है, पर कई ऐसे भी हैं जिन्हें इसकी कोई परवाह नहीं होती — जैसा इस घटना में दिखा। रात में विपरीत दिशा से आती हेडलाइट की चमक में अंधेरे में खड़ा ट्रक दिखाई ही नहीं देता, और दुर्घटना घट जाती है।

❓ दूसरा सवाल — क्या हाईवे पेट्रोलिंग हो रही थी?

क्या पेट्रोलिंग पार्टी ने इस ट्रक को नहीं देखा था? यदि ₹50–₹100 लेकर इस ट्रक की अनदेखी की गई थी, तो ऐसे पुलिसवालों पर भी हत्या का आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए। आज रजिस्ट्रेशन नंबर से ही गाड़ी मालिक का पता चल जाता है — ऐसे ट्रकों पर पुलिसिया कार्रवाई होने से चालक भी रेडियम पट्टी लगाने को मजबूर होंगे।

❓ तीसरा सवाल — ‘खास’ और ‘आम’ के बीच क्यों है इतनी बड़ी खाई?

हमारे राज्य के लोगों की सोच में आज भी ‘खास’ और ‘आम’ के बीच एक बड़ी खाई व्याप्त है, जो अत्यंत पीड़ादायक है। खबरों और प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट दिखा कि मंत्री की पुत्री की मृत्यु का दुख लोगों को ज्यादा हुआ, जबकि वंशिका, तृषा, नमन और सार्थक — इन सभी के प्रति समान रूप से गहरी संवेदना होनी चाहिए। ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी परिजनों को इस कठिन घड़ी का सामना करने की शक्ति दे।

❓ चौथा सवाल — हम स्वयं से पूछें, कैसे माता-पिता बनते जा रहे हैं?

पिछले ही सप्ताह मुंबई के मरीन ड्राइव में भी इसी तरह दो बच्चों को खोया गया था। अंतिम सवाल स्वयं से है — हम कैसे माता-पिता बनते जा रहे हैं? अपने बच्चों को कितना समय और क्या संस्कार दे रहे हैं? इतनी कम उम्र, इतनी रात, इतनी तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने जैसे सवालों को अब गंभीरता से लेना होगा — वरना भविष्य में और भी ऐसे धक्के सहने पड़ेंगे।

लेखक: डॉ. सुकल्याण मोइत्रा

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