जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का लिया संकल्प, पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों की दी गई जानकारी
चतरा। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के तत्वावधान में चतरा जिले के लावालौंग, सिमरिया, कुंदा एवं प्रतापपुर प्रखंड के 117 अनुसूचित जनजाति (एसटी) एवं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) बहुल गांवों में विशेष ग्रामसभा, जागरूकता कार्यक्रम एवं जागरूकता रैली का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य आदिवासी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना रहा।
विशेष ग्रामसभाओं में ग्रामीणों के साथ विश्व आदिवासी दिवस के महत्व, आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों, पारंपरिक ज्ञान, संस्कृति, सामाजिक सहभागिता तथा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के प्रति ग्रामीणों को जागरूक किया गया।
इस दौरान ग्रामीणों, स्वयं सहायता समूहों की दीदियों, सामुदायिक कैडरों एवं स्थानीय समुदाय के सदस्यों की सहभागिता से जागरूकता रैली निकाली गई। रैली के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, सामुदायिक सहभागिता और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का संदेश दिया गया। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया।
पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों पर जोर
ग्रामसभाओं के दौरान पारंपरिक जल संरक्षण एवं जल प्रबंधन प्रणालियों पर विशेष जोर दिया गया। ग्रामीणों को बताया गया कि आदिवासी समाज द्वारा पीढ़ियों से अपनाई जा रही पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकें आज भी जल संकट के समाधान में प्रभावी और प्रासंगिक हैं।
इस अवसर पर बावड़ियों, भूमिगत जल टैंकों, मिट्टी के बांधों, पहाड़ी नहरों तथा बांस आधारित ड्रिप सिंचाई प्रणाली जैसी पारंपरिक तकनीकों की जानकारी साझा की गई। बताया गया कि इन विधियों से वर्षा जल संचयन, भू-जल स्तर का पुनर्भरण, जल अपवाह पर नियंत्रण तथा कृषि एवं घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।
कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीणों को संदेश दिया गया कि जल, जंगल और जमीन का संरक्षण केवल शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक और समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। सामुदायिक सहभागिता, पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से ही सतत विकास तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।

कार्यक्रम में ग्रामीणों, स्वयं सहायता समूहों की दीदियों, सामुदायिक कैडरों एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने सक्रिय सहभागिता निभाई और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।






















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