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कमीशनखोरी के आरोपों के बाद अब तालाबंदी को लेकर सुर्खियों में आए निकाय प्रतिनिधि, बिना पूर्व सूचना सरकारी कार्यालय ठप करने पर खड़े हुए गंभीर विधिक सवाल

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नगर परिषद बना ‘सियासी अखाड़ा’: जनता के काम रोकने के लिए अध्यक्ष-उपाध्यक्ष ने 24 घंटे में की तालाबंदी और खुद ही खोला ताला; एडवोकेट ने उठाई उच्च स्तरीय जांच की मांग

न्यूज स्केल लाइव ब्यूरो

गुमला। आम जनता अब इतनी बेवकूफ नहीं है कि जनप्रतिनिधियों के सियासी स्टंट और धरातल के सच में फर्क न समझ सके। लोकतंत्र में विधानसभा हो या लोकसभा, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तकरार होना आम बात है। जनता हमेशा से देखती आई है कि नेताओं की आपसी नोंक-झोंक के कारण पार्लियामेंट से लेकर विधानसभा तक की विधिक कार्यवाही और जनता के काम बाधित होते हैं।

लेकिन गुमला नगर परिषद (Gumla Municipal Council) में आम चुनाव से चयनित होकर आए जनप्रतिनिधियों के बीच पक्ष-विपक्ष जैसी कोई वैधानिक व्यवस्था न होने के बावजूद इसे ‘राजनीति का अखाड़ा’ बना दिया गया है। मीडिया (Media) के माध्यम से अब जनता के बीच यह बात पूरी तरह जगजाहिर हो चुकी है कि शहर के विकास के नाम पर केवल अपनी राजनीतिक गोटियां सेकी जा रही हैं।

कमीशनखोरी के आरोपों से शुरू हुआ खेल, 24 घंटे में खुला अपनी ही तालाबंदी का ताला

गुमला नगर परिषद के गठन के बाद से ही यहां का सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। शुरुआत में यहां कमीशनखोरी को लेकर जमकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। इसके बाद नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी (EO) के खिलाफ अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के नेतृत्व में वार्ड पार्षदों को एकजुट कर बकायदा मोर्चा खोल दिया गया।

हाल ही में विकास कार्यों में स्थानीय विधायक के हस्तक्षेप के बाद यहां की सियासत और गरमा गई। नतीजतन, अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के नेतृत्व में गुरुवार को नगर परिषद कार्यालय के मुख्य द्वार पर “विकास नहीं तो तालाबंदी” के नारे के साथ उग्र आंदोलन करते हुए ताला जड़ दिया गया। लेकिन हास्यास्पद स्थिति तब बन गई, जब आंदोलन का रास्ता तैयार करने वाले इन जनप्रतिनिधियों ने महज़ 24 घंटे के भीतर ही खुद अपने हाथों से कार्यालय का ताला खोलकर आंदोलन वापसी की दुहाई दे डाली। अब यह यू-टर्न सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भारी सुर्खियों में है। जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि आम नागरिकों की विधिक परेशानियों को देखते हुए यह आंदोलन समाप्त किया गया है, जबकि बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह सिर्फ अखबारों में सुर्खियां बटोरने का एक नाकाम पैंतरा था।

“तालाबंदी कानूनी रूप से अवैध, हो उच्च स्तरीय जांच” : एडवोकेट खुर्शीद आलम

नगर परिषद कार्यालय में बिना किसी पूर्व प्रशासनिक सूचना के की गई इस तालाबंदी को लेकर विधिक विशेषज्ञों ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। जाने-माने एडवोकेट खुर्शीद आलम ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने सोशल मीडिया (फेसबुक) हैंडल पर लिखा है कि:

“जनप्रतिनिधियों द्वारा किया गया यह आंदोलन किसी भी दृष्टिकोण से संवैधानिक नहीं है। यह सीधे तौर पर विकास कार्यों में बाधा डालने और आम नागरिकों को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से किया गया कृत्य है। बिना किसी पूर्व विधिक सूचना के सरकारी कार्यालय को ठप करना, जिससे आम नागरिकों के रोजमर्रा के जरूरी काम जैसे— जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate), मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) और होल्डिंग/मकान टैक्स (Property Tax) जमा करने जैसे कार्य पूरी तरह रुक गए, कानूनी रूप से बिल्कुल भी वैध नहीं है। इस गैर-कानूनी तालाबंदी की उच्च स्तरीय प्रशासनिक जांच होनी चाहिए और दोषी जनप्रतिनिधियों पर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय विधायक को आगे आने की जरूरत है।”

                  गुमला नगर परिषद तालाबंदी विवाद: एक नजर में
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│ मुख्य प्रभावित कार्यालय        │ नगर परिषद कार्यालय, गुमला (झारखंड)            │
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│ आंदोलन का नेतृत्वकर्ता         │ नगर परिषद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष                │
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│ प्राथमिक राजनीतिक कारण        │ कमीशनखोरी के आरोप व विकास कार्यों में विधायक का दखल│
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│ आंदोलन की विधिक अवधि          │ महज़ 24 घंटे (गुरुवार को तालाबंदी, शुक्रवार को वापसी)│
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│ प्रभावित नागरिक सेवाएं        │ जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, मकान टैक्स व विकास कार्य │
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│ विधिक आपत्ति (कानूनी राय)       │ एडवोकेट खुर्शीद आलम द्वारा जांच व FIR की मांग  │
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सुर्खियां बटोरने के चक्कर में जनता के अधिकारों से खिलवाड़ का आरोप

गुमला की प्रबुद्ध जनता अब इन जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठा रही है। शहर के बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि आंदोलन विकास के लिए था, तो महज़ 24 घंटे में ऐसा क्या प्रशासनिक बदलाव हो गया कि बिना किसी लिखित समझौते के ताला खोल दिया गया? साफ है कि इस ड्रामे के पीछे कोई ठोस नीति नहीं थी, बल्कि सिर्फ अपनी राजनीतिक धौंस जमाना था।

अब देखना यह है कि एडवोकेट खुर्शीद आलम द्वारा उठाई गई इस कानूनी मांग पर जिला प्रशासन और स्थानीय विधायक क्या विधिक कदम उठाते हैं, ताकि भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि आम जनता के बुनियादी विधिक अधिकारों और सरकारी कामकाज को अपनी व्यक्तिगत राजनीति के लिए बंधक न बना सके।

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