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मनरेगा कानून व नाम बदलने के खिलाफ कांग्रेस का आंदोलन, 5 जनवरी को ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ पैदल मार्च

On: January 3, 2026 10:48 PM
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तीन चरणों में होगा आंदोलन, पहला चरण (8 जनवरी से 30 जनवरी)

रांची: मनरेगा कानून एवं नाम में बदलाव के विरोध में झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी 5 जनवरी को ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ अभियान के तहत बापू वाटिका, मोराबादी से लोक भवन तक पैदल मार्च करेगी। इसकी जानकारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने रांची में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि केंद्र सरकार की नई योजना ग्रामीण भारत की रीढ़ मानी जाने वाली मनरेगा को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने बताया कि यह आंदोलन पूरे देश में तीन चरणों में चलाया जाएगा।

तीन चरणों में होगा आंदोलन
पहला चरण (8 जनवरी से 30 जनवरी)
8 जनवरी: राज्य प्रभारी के साथ राज्यस्तरीय तैयारी बैठक।
10 जनवरी: जिला स्तर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस।
11 जनवरी: गांधी या अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष एकदिवसीय उपवास एवं धरना।
12 से 30 जनवरी: पंचायत स्तर पर चौपाल, कांग्रेस अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष के पत्र का वितरण, नुक्कड़ सभा और पंपलेट वितरण।
30 जनवरी (शहीद दिवस): मनरेगा कार्यकर्ताओं एवं आंदोलनकारियों की बैठक।

दूसरा चरण (31 जनवरी से 15 फरवरी)
31 जनवरी से 6 फरवरी: जिला स्तर पर ‘मनरेगा बचाओ’ धरना।
7 फरवरी से 15 फरवरी: राज्य स्तरीय विधानसभा या लोक भवन घेराव।

तीसरा चरण (16 से 25 फरवरी)
देशभर में चार क्षेत्रीय स्तर पर ‘मनरेगा बचाओ’ रैलियों का आयोजन।

कांग्रेस नेताओं के तीखे आरोप
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा कि मनरेगा का नाम बदलना ग्रामीण भारत पर सीधा हमला है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले योजनाओं का चयन गांव स्तर पर होता था, लेकिन अब केंद्र सरकार तय करेगी कि किस पंचायत में कौन सी योजना चलेगी, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है और कोरोना काल में इसने गांवों में संजीवनी का काम किया, लेकिन केंद्र सरकार इसे कमजोर करने पर तुली है।

वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि भाजपा की विचारधारा महात्मा गांधी के विचारों के विपरीत है। गांधी के नाम को हटाकर नई योजना लाना भाजपा की पूंजीवादी सोच को दर्शाता है, जो ग्रामीण रोजगार और समृद्धि नहीं चाहती।

पूर्व वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने कहा कि भाजपा सरकार ने मनरेगा की मूल भावना को ही खत्म कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बरसात के दिनों में रोजगार के अवसर घटा दिए गए हैं, जबकि मनरेगा में उस समय भी कई तरह के कार्य संभव थे। साथ ही नई योजना में 60-40 अंशदान का प्रावधान झारखंड जैसे गरीब राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।

डॉ. उरांव ने कहा कि यदि मनरेगा में कमियां थीं तो उसमें सुधार किया जा सकता था, लेकिन पूरी योजना को कमजोर करना समाधान नहीं है।

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