1941 से चली आ रही प्रथा, पिता लगाते हैं नंबर तो बेटे को मिलता है सौभाग्य; नवरात्र के पांचवें दिन स्कंदमाता को अर्पित होता है मुकुट
मयूरहंड (चतरा)। मयूरहंड प्रखंड मुख्यालय में मां दुर्गा को मुकुट पहनाने की एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां कई बार मुकुट चढ़ाने का नंबर पिता लगाते हैं, लेकिन यह सौभाग्य बेटे को मिलता है। इस परंपरा के कारण वर्ष 2069 में मुकुट कौन चढ़ाएगा, इसका फैसला भी वर्षों पहले हो चुका है। अब कोई नया श्रद्धालु मुकुट चढ़ाना चाहे तो उसकी बारी 2069 के बाद ही आएगी। दुर्गा पूजा की बैठक के दौरान ही ये नंबर लगाए जाते हैं। इस वर्ष पिंटू राणा, अभय राणा और नरेश कुमार राणा ने मुकुट चढ़ाने का नंबर लगाया है।

यह परंपरा गांव में वर्ष 1941 से चली आ रही है। गांव के तोकी महतो ने करीब 25 वर्ष पहले मुकुट चढ़ाने का नंबर लगाया था। इस वर्ष 2026 में उनके बेटे रघुनाथ महतो और थानू महतो को मां दुर्गा को मुकुट चढ़ाने का अवसर मिला। नंबर आने का इंतजार करते-करते तोकी महतो का निधन हो गया। ऐसा कई भक्तों के साथ हो चुका है। गांव का नियम है कि यदि किसी की मृत्यु मुकुट चढ़ाने से पहले हो जाती है, तो नंबर आने पर उसके परिजनों, खासकर बेटे को यह मौका दिया जाता है।
दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अश्विनी सिंह ने बताया कि मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता को मुकुट अर्पित किया जाता है और यह परंपरा सात दशकों से चल रही है। पूजा शुरू होने से एक महीने पहले ही समिति की बैठक शुरू हो जाती है, जिसमें आसपास के कई गांवों के लोग भी शामिल होते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार भक्त स्वयं मुकुट चढ़ाने की इच्छा जताते हैं। एक से अधिक इच्छुक होने पर बुकिंग कर उन्हें क्रमानुसार नंबर दिए जाते हैं। नवरात्र के पांचवें दिन जिसका नंबर होता है, वह अपने घर से मुकुट के साथ जुलूस लेकर पंडाल पहुंचता है। वहां विधि-विधान से पूजा के बाद माता को मुकुट पहनाया जाता है। इस मौके पर कई गांवों के लोग शामिल होते हैं।

मुकुट विशेष माना जाता है और बंगाल के कारीगरों से तैयार कराया जाता है। इसके निर्माण में करीब 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है। ये कारीगर नवरात्र शुरू होते ही मयूरहंड पहुंच जाते हैं और मुकुट के साथ माता की प्रतिमा भी तैयार करते हैं।


















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