पंचायत के कुबा गांव में करीब एक करोड़ की लागत से हो रहा था निर्माण, एनओसी और भूमि की वैधता पर उठे सवाल
चतरा। जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड अंतर्गत बरवाडीह पंचायत में प्रस्तावित पैक्स भवन के निर्माण को लेकर मामला सामने आया है। पंचायत मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर कुबा गांव में निर्माणाधीन पैक्स भवन पर वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए निर्माण को ध्वस्त कर दिया। वन विभाग की ओर से वन भूमि पर अतिक्रमण के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने की जानकारी है।
मिली जानकारी के अनुसार, बरवाडीह पंचायत के पैक्स भवन का निर्माण करीब एक करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कराया जा रहा था। भवन का निर्माण पंचायत मुख्यालय से काफी दूरी पर स्थित कुबा गांव में कराया जा रहा था। बताया गया कि कार्रवाई से पहले भवन का लिंटर स्तर तक निर्माण हो चुका था, जिस पर लाखों रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आ रही है।
एनओसी के बिना निर्माण कैसे शुरू हुआ?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि निर्माणाधीन भवन की भूमि वन विभाग की जमीन थी और इसके लिए आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं लिया गया था, तो निर्माण कार्य शुरू कैसे हुआ।
वहीं, यदि निर्माण से पहले भूमि संबंधी जांच अथवा अंचल स्तर से रिपोर्ट प्राप्त की गई थी, तो वन भूमि पर निर्माण की अनुमति किस आधार पर मिली—यह भी जांच का विषय है।

अंचल रिपोर्ट और भूमि की जांच पर भी सवाल
जानकारी के अनुसार, पंचायत स्तर के महत्वपूर्ण भवन के निर्माण के लिए भूमि का चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया, इसकी भी जांच जरूरी मानी जा रही है। विशेष रूप से यह पता लगाया जाना आवश्यक है कि निर्माण स्थल की भूमि का राजस्व एवं वन रिकॉर्ड में क्या दर्जा है और भवन निर्माण से पहले संबंधित विभागों से आवश्यक स्वीकृति तथा एनओसी ली गई थी या नहीं।
यदि भूमि चयन के दौरान अंचल स्तर से कोई रिपोर्ट दी गई थी, तो उस रिपोर्ट में जमीन की प्रकृति क्या बताई गई थी, यह महत्वपूर्ण सवाल है। वहीं, यदि ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं ली गई थी तो बिना भूमि सत्यापन के निर्माण कार्य शुरू कराने की जिम्मेदारी किसकी थी, इसकी भी जांच की जरूरत है।
लाखों खर्च होने के बाद ध्वस्त हुआ निर्माण
बताया गया कि वन विभाग की कार्रवाई के समय भवन का निर्माण लिंटर स्तर तक पहुंच चुका था। ऐसे में निर्माण पर खर्च हुई सरकारी राशि के उपयोग और संभावित नुकसान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
अब यह जांच का विषय है कि भवन निर्माण के लिए स्थल का चयन किस अधिकारी अथवा संबंधित स्तर की अनुशंसा पर हुआ, तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति किस आधार पर मिली और निर्माण शुरू करने से पहले वन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र लिया गया था या नहीं।
जिम्मेदारी तय करने की जरूरत
पूरे मामले में यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि भवन निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध कराने और चयन की प्रक्रिया में पंचायत, अंचल, संबंधित विभाग तथा संवेदक की क्या भूमिका रही। यदि वन भूमि पर बिना आवश्यक अनुमति के निर्माण कराया गया है तो इसके लिए जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
फिलहाल वन विभाग की कार्रवाई के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है। वन भूमि पर अतिक्रमण के आरोप में दर्ज प्राथमिकी की जांच के साथ-साथ यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि करीब एक करोड़ रुपये की लागत वाले भवन के लिए विवादित भूमि का चयन किस स्तर पर और किन दस्तावेजों के आधार पर किया गया था। अब निगाहें वन विभाग की जांच, प्राथमिकी में सामने आने वाले तथ्यों तथा संबंधित अंचल और निर्माण विभाग के रिकॉर्ड पर टिकी हैं।
























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