लोहरदगा। आस्था, इश्क़ और इंसानियत का पैग़ाम लेकर शहंशाह-ए-लोहरदगा हजरत बाबा दुखन शाह (रहमतुल्लाह अलैह) का 101वां सालाना उर्स पूरे रूहानियत और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। उर्स के दूसरे दिन आयोजित महफिल-ए-कव्वाली ने लोहरदगा की फिज़ाओं को देशभक्ति, भाईचारे और मोहब्बत के रंगों से सराबोर कर दिया। अंजुमन इस्लामिया लोहरदगा एवं उर्स इंतजामिया कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में देर रात तक चले कव्वाली मुकाबले में हजारों जायरीन और श्रद्धालु शामिल हुए। अकीदतमंदों ने मजार पर हाजिरी देकर अमन-चैन, सौहार्द और देश की तरक्की की दुआ मांगी।
भव्य कव्वाली मुकाबले का उद्घाटन मुख्य अतिथि सुखदेव भगत, उद्घाटनकर्ता अनुप सिंह और अंजुमन इस्लामिया के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से फीता काटकर किया। सांसद सुखदेव भगत ने बाबा को खुदा का वली बताते हुए कहा कि साफ दिल से मांगी गई दुआ जरूर कबूल होती है—इश्क़-ए-खुदा, इल्म और बेहतर सोच से समाज बुलंदी पाता है। विधायक अनुप सिंह ने उर्स को एकता और शांति का प्रतीक बताते हुए कहा कि बाबा के दर पर जाति-धर्म का भेद नहीं, यहां हर इंसान को दुआ मिलती है। उन्होंने शांतिपूर्ण आयोजन के लिए पुलिस-प्रशासन की सराहना भी की।
पुलिस अधीक्षक सादिक अनवर रिज़वी ने कहा कि बाबा की आस्था सब पर है—इसी कारण हर वर्ष पहली चादर पुलिस विभाग की ओर से चढ़ाई जाती है। अतिथियों का स्वागत अंजुमन इस्लामिया के सदर अब्दुल रऊफ अंसारी, सचिव शाहिद अहमद बेलू, नाजिम-ए-आला हाजी अब्दुल जब्बार अंसारी सहित पदाधिकारियों ने पगड़ीपोशी व शॉल ओढ़ाकर किया, जबकि उर्स इंतजामिया कमेटी के सदस्यों को बैज लगाकर सम्मानित किया गया।
15 जनवरी की रात कव्वाली में आतिश मुराद (कर्नाटक) और चांद कादरी (दिल्ली) के बीच शानदार मुकाबला हुआ। आतिश मुराद के “भर दे झोली या मोहम्मद”, “क्योंकि मेरे वर्दी में भारत बोलता है” जैसे कलाम और चांद कादरी के “लहू अपने दे दो चमन के लिए”, “जो सरहद पे शहादत मिले” जैसे देशभक्ति से ओतप्रोत कलामों ने महफिल को यादगार बना दिया। हम्द, नात, ग़ज़ल और शहीदी कव्वाली ने माहौल को और रूहानी कर दिया। उर्स ने एक बार फिर साबित किया कि हजरत बाबा दुखन शाह (रअ) की दरगाह प्रेम, भाईचारे, देशभक्ति और इंसानियत का जीवंत प्रतीक है—जहां हर मजहब और हर तबके के लोग एक साथ सिर झुकाते हैं।





















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