
शारदीय नवरात्र तीसरा दिन : माँ चन्द्रघंटा, इस मंत्र का करे जाप – पिंडज प्रवररूढां चंडकोपास्त्र कैर्युतां ।
प्रसादं तनुते मध्यं चंद्रघंटेती विश्रुतां ।।
देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप माँ चन्द्रघंटा का है । ये ही भगवान शिव की शक्तियों की आधार हैं । ये देवी सरस्वती का ही स्वरूप हैं । छात्रों ,संगीत और साहित्य में रुचि रखने वालों की देवी हैं जो केवल एक बीज मंत्र से आश्चर्यजनक परिणाम देती हैं । इस देवी का पूजन हल्दी और पीले पुष्प से की जाती है । शिखर पर चन्द्र और नाद इनकी शक्ति है । इन्हें नाद प्रिय है । सृष्टि के संरचना के बाद स्वर , व्यंजना , रूप , रस , गन्ध और संगीत का प्रादुर्भाव हुआ । यही शक्ति वाग्देवी कहलायीं । देवासुर संग्राम में देवी ने महिषासुर से युद्ध किया था । नाद को इन्होंने अपना शस्त्र – शास्त्र कहा है । श्रीदुर्गा सप्तशती में नाद अर्थात स्वर विज्ञान को देवी तत्व माना गया है । दशभुजी , स्वर्ग स्वरूप माँ चन्द्रघंटा शांति की प्रतीक हैं पर युद्ध के लिए तत्पर रहती हैं । उन्होंने असुरों के संहार के लिए शस्त्रों के साथ नाद का भी प्रयोग किया । अपने इस चरित के माध्यम से ये देवी कहती हैं – ‘ मित्र कभी स्थाई नहीं रहते हैं । हमारे मन , वचन और कर्म ही मित्र और शत्रु बनते हैं । यही तीनों चीजें हमारे दुख और तनाव का कारण भी होती हैं । ‘ अतः चन्द्रघंटा भगवती मन , वचन और कर्म को सही करने की शिक्षा देती हैं ।
या देवी सर्वभूतेषु चंदघंटा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।








