चाय बागान मजदूरों के हक और ST दर्जे की मांग को लेकर तेज हुई सियासत
कल्पना मुर्मू सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव 2026 में जोरदार तरीके से चुनावी कमान संभालते हुए आदिवासी अधिकारों को केंद्र में ला दिया है। उनकी आक्रामक चुनावी शैली को “कल्पना की दहाड़” कहा जा रहा है, जिसमें वे तीर-धनुष के चुनाव चिन्ह पर वोट मांगते हुए जनसभाओं में आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और मजदूरों के हक की आवाज बुलंद कर रही हैं। चुनावी रैलियों के दौरान उन्होंने चाय बागान मजदूरों और आदिवासी समाज की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पीढ़ियों से असम की धरती से जुड़े आदिवासी आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी माताओं-बहनों ने अपने पसीने से असम की चाय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, लेकिन उन्हें आज तक वह सम्मान और हक नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पीड़ा और सच्चाई है, जिसे अब बदलना जरूरी है। “जब जन्म से लेकर जीवन के हर पहलू में आदिवासियत बसती है, तो फिर असम के आदिवासियों को अब तक अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा क्यों नहीं मिला?” झारखंड मुक्ति मोर्चा की नेता ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार बनती है, तो सबसे पहला कदम असम के आदिवासी समाज को ST का दर्जा दिलाने की दिशा में उठाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज के सम्मान और अधिकार की लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिल जाता। इस मुद्दे को लेकर चुनावी माहौल में नई बहस छिड़ गई है और चाय बागान क्षेत्रों में इसका खासा असर देखा जा रहा है।





















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