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महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला: अब मंत्री–विधायक आएंगे तो अधिकारियों को उठकर करना होगा स्वागत

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महाराष्ट्र सरकार ने प्रशासनिक आचरण को सख्ती से दुरुस्त करने के लिए एक बड़ा और विवादों से घिरने वाला निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने नई अधिसूचना जारी करते हुए कहा है कि अब किसी भी विधायक या सांसद के सरकारी कार्यालय में प्रवेश करते ही संबंधित अधिकारी को अपनी सीट से तुरंत उठकर उनका स्वागत करना होगा और पूरी विनम्रता के साथ उनके मुद्दों को सुनना होगा।

मुख्य सचिव राजेश कुमार द्वारा जारी आदेश में साफ कहा गया है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को सम्मान देना लोकतांत्रिक परंपरा और सुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि कोई अधिकारी इन दिशानिर्देशों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

शिकायतों के बाद आया आदेश

हाल के दिनों में कई विधायकों और सांसदों ने सरकार से शिकायत की थी कि, अधिकारी समय पर नहीं मिलते, समस्याओं को गंभीरता से नहीं सुनते और कई बार जनप्रतिनिधियों के साथ “असम्मानजनक व्यवहार” करते हैं। इन्हीं शिकायतों के मद्देनज़र सरकार ने प्रशासनिक व्यवहार को सुधारने के लिए यह कदम उठाया है।

ऑफिस में प्रवेश से लेकर फोन कॉल तक—हर स्तर पर ‘सम्मान’ अनिवार्य

जारी अधिसूचना में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि— जैसे ही कोई विधायक/सांसद कार्यालय में प्रवेश करे, अधिकारी कुर्सी से उठकर उनका स्वागत करें।  बातचीत के दौरान सभ्य भाषा और शिष्टाचार का पालन अनिवार्य होगा।  फोन पर भी जनप्रतिनिधियों से सम्मानजनक शैली में संवाद करना होगा। साथ ही सरकार ने कहा कि यह सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे में जनता के प्रतिनिधियों के प्रति “संस्थागत सम्मान” का हिस्सा है।

पत्रों पर अब दो महीने में जवाब अनिवार्य

नए दिशा-निर्देशों के तहत: प्रत्येक सरकारी कार्यालय में विधायकों और सांसदों से प्राप्त पत्रों के लिए अलग रजिस्टर रखा जाएगा। हर पत्र का जवाब अधिकतम दो महीने के भीतर देना अनिवार्य होगा। देरी होने पर मामला विभागाध्यक्ष तक जाएगा और संबंधित जनप्रतिनिधि को औपचारिक रूप से सूचित किया जाएगा।

कदम का उद्देश्य—सुशासन या सत्ता का दबाव?

सरकार का दावा है कि यह फैसला जवाबदेही और सुशासन को मजबूत करने के लिए है। हालांकि प्रशासनिक हलकों में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। कई अधिकारियों का कहना है कि यह आदेश प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ा सकता है, जबकि जनप्रतिनिधि इसे जनता से जुड़े मुद्दों को तेजी से सुलझाने के लिए आवश्यक कदम बता रहे हैं।

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